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मोबाइल बन रहा खतरा: पांच साल से कम उम्र के बच्चे रोजाना 2.2 घंटे बिता रहे स्क्रीन पर, सेफ्टी लिमिट से दोगुना ज्यादा

नई दिल्ली: बच्चों में मोबाइल फोन का बढ़ता उपयोग चिंता का कारण बनता जा रहा है। एक हालिया स्टडी में खुलासा हुआ है कि भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चे प्रतिदिन औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं, जो सुरक्षित सीमा से दोगुना अधिक है। एम्स रायपुर के आशीष खोबरागड़े और एम. स्वाति शेनॉय द्वारा क्यूरियस पत्रिका में प्रकाशित इस स्टडी में बताया गया कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन टाइम बिल्कुल नहीं देना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद बच्चे औसतन 1.2 घंटे मोबाइल या अन्य स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं।

अध्ययन के लिए 2,857 बच्चों पर रिसर्च की गई और 10 अलग-अलग अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। परिणामों ने यह स्पष्ट किया कि बच्चों में मोबाइल का बढ़ता उपयोग सिर्फ आंखों की परेशानी ही नहीं, बल्कि भाषा विकास, संज्ञानात्मक क्षमताओं, सामाजिक कौशल, नींद की गुणवत्ता और मोटापे जैसी कई समस्याओं को जन्म दे रहा है।

बच्चों को चुप कराने, ध्यान भटकाने और व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना आम होता जा रहा है, लेकिन इसका असर लंबे समय तक उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पेरेंट्स को टेक-फ्री जोन बनाना चाहिए, बच्चों के स्क्रीन टाइम की समयसीमा तय करनी चाहिए और उनके साथ ज्यादा वक्त बिताकर उन्हें ऑफलाइन एक्टिविटीज में शामिल करना चाहिए।

फेलिक्स हॉस्पिटल के चेयरमैन व चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. डी.के. गुप्ता ने बताया कि 5 साल से कम उम्र के करीब 60-70% बच्चे जरूरत से ज्यादा समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं, जिससे उनमें गंभीर शारीरिक व व्यवहारिक समस्याएं देखी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनना चाहिए और खुद भी स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित करना चाहिए।

गाजियाबाद के चीफ मेडिकल ऑफिसर ने बताया कि उनके पास ऐसे 10-12 साल के बच्चे लाए जा रहे हैं जो इंटरनेट की आदत के चलते अपने पेरेंट्स द्वारा रोके जाने पर आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि मोबाइल बच्चों के लिए मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

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