छत्तीसगढ़ में अब निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक: सरकारी किताबें होंगी अनिवार्य, जनता ने फैसले का किया स्वागत

रायपुर। प्रदेश में शिक्षा को बेहतर और सस्ती बनाने की कोशिशें अब तेज हो गई हैं। सरकार ने नई शिक्षा नीति 2020 के तहत सभी निजी स्कूलों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे सिर्फ एनसीईआरटी और एससीईआरटी की किताबों से ही पढ़ाई कराएं।
दरअसल, अब तक कई निजी स्कूल बच्चों को महंगी किताबें खरीदने पर मजबूर करते रहे हैं। इन किताबों पर स्कूल प्रबंधन को भारी कमीशन मिलता है, इसलिए वे सरकारी किताबों की जगह निजी प्रकाशकों की किताबें थमा देते हैं। साथ ही स्कूल ड्रेस, जूते, कॉपी-किताब, पेन जैसी हर चीज़ अपनी तय की हुई दुकानों से ही खरीदने का दबाव डालते हैं।
अगर कोई पालक इन बातों से इनकार करता है, तो बच्चों को मानसिक रूप से परेशान किया जाता है और स्कूल से निकालने की धमकी दी जाती है।
शासन के इस फैसले को आम जनता ने राहत की तरह लिया है। लेकिन इसके उलट कई सरकारी स्कूलों में भी लापरवाही और भ्रष्टाचार की शिकायतें मिल रही हैं। कुछ स्कूलों में दाखिले के नाम पर “सीट नहीं है” का बहाना बनाकर बच्चों को लौटा दिया जाता है।
पांच साल में 30-50% तक बढ़ चुकी है फीस
निजी स्कूलों की फीस में पिछले पांच सालों में 30 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है। ऊपर से डोनेशन और अन्य शुल्कों के नाम पर अलग से वसूली की जा रही है।
स्कूल बन गए हैं दुकानें
निजी स्कूल अब शिक्षा देने की जगह पैसा कमाने का जरिया बन गए हैं। एक आम आदमी के लिए बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाना अब मुश्किल होता जा रहा है। एजेंटों के जरिए किताबें, ड्रेस और अन्य जरूरी सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
फर्जीवाड़े से चल रहे हैं कई स्कूल
कुछ स्कूलों की मान्यता तो पहले ही खत्म कर दी गई थी, लेकिन अफसरों से मिलीभगत कर उन्होंने फिर से स्कूल चालू कर लिए हैं। कुछ स्कूल एक ही नाम से कई ब्रांच खोलकर फर्जी तरीके से बच्चों से पैसे वसूलते हैं और परीक्षा भी दिलवा देते हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या सरकार इन निजी स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम कस पाएगी? जनता उम्मीद कर रही है कि शिक्षा को व्यापार नहीं, सेवा का माध्यम माना जाएगा और बच्चों को सस्ती और अच्छी शिक्षा मिल सकेगी।





