भारत और चीन दुनिया की टॉप 4 अर्थव्यवस्थाएं, फिर भी G7 का हिस्सा क्यों नहीं?

टोरंटो:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कनाडा पहुंचे हैं। हालांकि भारत इस समूह का औपचारिक सदस्य नहीं है, फिर भी 2003 से लगातार ‘आउटरीच पार्टनर’ के तौर पर इसमें भाग लेता रहा है। जी7 की शुरुआत 1975 में G6 के रूप में हुई थी, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और अमेरिका शामिल थे। 1976 में कनाडा के जुड़ने से यह G7 बना। 1997 में रूस शामिल हुआ, जिससे यह G8 बना, लेकिन 2014 में क्रीमिया विवाद के बाद रूस को समूह से बाहर कर दिया गया।

भारत और चीन दोनों ही आज दुनिया की शीर्ष चार अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, लेकिन फिर भी वे G7 का हिस्सा नहीं हैं। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि G7 मूल रूप से विकसित देशों का समूह है। जब इसका गठन हुआ था, तब भारत और चीन विकासशील देश माने जाते थे और उनकी प्रति व्यक्ति आय बेहद कम थी। आज भी इन दोनों देशों की प्रति व्यक्ति आय G7 देशों की तुलना में काफी कम है।

चीन पहले भी G7 की प्रासंगिकता पर सवाल उठा चुका है। उसका कहना है कि ये समूह आज की वैश्विक जनसंख्या और आर्थिक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता क्योंकि इसमें शामिल देशों की कुल जनसंख्या विश्व की सिर्फ 10% है। इसके अलावा, चीन का यह भी मानना है कि G7 का वैश्विक आर्थिक योगदान अब उतना प्रभावशाली नहीं रहा जितना पहले था।

भारत को पहली बार 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इस सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। उसके बाद मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी कई बार इस सम्मेलन में भाग ले चुके हैं। हालांकि G7 ने अभी तक अपने सदस्य देशों की संख्या नहीं बढ़ाई है, इसलिए भारत और चीन जैसे देशों को अब भी केवल अतिथि के रूप में ही बुलाया जाता है।

G7 की सदस्यता केवल विकसित और उच्च प्रति व्यक्ति आय वाले देशों तक सीमित रहने के कारण भारत और चीन का इसमें शामिल होना फिलहाल संभव नहीं दिखता।

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