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ये कैसा सुशासन: साय सरकार में उपेक्षा की मार झेल रहा ‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों’ का गांव पटपरटोला

मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर। छत्तीसगढ़ बने हुए 25 साल हो गया लेकिन  भरतपुर वनांचल स्थित गढ़वार पंचायत का आश्रित ग्राम पटपरटोला आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।

लगभग 200 की आबादी वाला यह गांव साय सरकार में भी  सड़क और पीने के पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है। बारिश के मौसम में गांव की हालत और भी दयनीय हो जाती है, जब चारों ओर कीचड़ और दलदल का आलम बन जाता है। यहाँ जीवन एक जंग की तरह है, जहाँ हर दिन किसी नई चुनौती का सामना करना पड़ता है।

यह कोई साधारण गांव नहीं है, बल्कि ‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों’ के नाम से पहचाने जाने वाले पण्डो जनजाति के लोगों का बसेरा है। ये लोग मुख्यतः तेंदूपत्ता संग्रहण, वनोपज, खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके गांव की स्थिति एक उपेक्षित बस्ती से भी बदतर है। वर्षों से वे विकास की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिले हैं।

गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं

गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। केवल कच्ची पगडंडी ही जीवन का सहारा है, जिससे होकर लोग रोजमर्रा के कामों के लिए बाहर जाते हैं। बरसात में यह रास्ता कीचड़ में तब्दील हो जाता है, जिससे दोपहिया वाहन भी चलाना नामुमकिन हो जाता है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल तक पहुंचाना ग्रामीणों के लिए सबसे कठिन कार्य बन जाता है। गांव के ही शेषमान पण्डो बताते हैं कि बरसात के समय एक कदम चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता।

पानी के लिए जाना पड़ता है दूर

संतोष कुमार पण्डो बताते हैं कि गांव में न तो सड़क है और न ही पीने का पानी। महिलाओं और बच्चों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को टूटी-फूटी पगडंडियों से गुजरना पड़ता है और कई बार वे गिरकर घायल भी हो जाते हैं, लेकिन फिर भी वे पढ़ाई का सपना नहीं छोड़ते। छोटे बच्चे भी असुविधाओं के बीच शिक्षा की उम्मीद संजोए हुए हैं।

आवेदन दिया, लेकिन हर बार आश्वासन मिला

गांव के सरपंच रामफल पण्डो भी गांव की बदहाल स्थिति से आहत हैं। उन्होंने बताया कि वे पंचायत, जनपद, कलेक्टर, विधायक और मंत्रियों तक सड़क और पानी की मांग लेकर कई बार पहुंचे, आवेदन दिए, दौरे करवाए, लेकिन आज तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। केवल आश्वासन ही मिले, और वास्तविक काम अब तक शुरू नहीं हुआ।

शिकायत करने के बाद भी बदलाव नहीं

महिलाओं की पीड़ा भी कम नहीं है। ग्रामवासी मानमती बाई कहती हैं कि जब हर दिन पानी लाने में ही घंटे भर लग जाते हैं, तो और कुछ सोचने की फुर्सत नहीं रहती। शिकायतें करने के बावजूद कोई बदलाव नहीं हुआ और अब तो उन्होंने उम्मीद भी छोड़ दी है। पटपरटोला अकेला ऐसा गांव नहीं है, भरतपुर वनांचल के दर्जनों गांव आज भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रहे हैं। सरकार की योजनाएं फाइलों में सिमट कर रह गई हैं और अधिकारी सिर्फ कागजों में आंकड़ों की बाजीगरी कर रहे हैं। राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों का यह गांव आज भी वास्तविक विकास की राह ताक रहा है।

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