बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था – छोटे राज्य हों बेहतर, बड़े राज्यों से लोकतंत्र को खतरा

14 अप्रैल को बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई जाती है। इस मौके पर उनके संविधान निर्माण, सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़े विचारों की खूब चर्चा होती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आंबेडकर ने छोटे राज्यों की वकालत भी की थी। उनका मानना था कि छोटे राज्य न केवल बेहतर शासन दे सकते हैं, बल्कि लोकतंत्र की जवाबदेही को भी मजबूत करते हैं।
1955 में दी थी बड़े राज्यों को विभाजित करने की सलाह
आंबेडकर ने साल 1955 में लिखी अपनी किताब “Thoughts on Linguistic States” में बड़े राज्यों को विभाजित कर छोटे राज्य बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि बिहार और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों का प्रशासन कठिन है और इससे कई इलाके विकास से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों का निर्माण सिर्फ शासन चलाने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान विकास के लिए भी होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश को तीन भागों में बांटने का सुझाव
आंबेडकर ने उत्तर प्रदेश को भी तीन हिस्सों में बांटने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक राज्य की आबादी लगभग दो करोड़ होनी चाहिए ताकि प्रशासन आसान हो सके। उन्होंने तीन नई राजधानियों के रूप में मेरठ, कानपुर और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का सुझाव दिया था। उनका तर्क था कि छोटी आबादी वाले राज्य प्रशासन पर बेहतर नजर रख सकते हैं।
मायावती ने भी उठाया था राज्यों के बंटवारे का मुद्दा
साल 2011 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने भी यूपी को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा था – पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और अवध। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। लेकिन यह दिखाता है कि आंबेडकर के विचार समय के साथ और भी प्रासंगिक हो गए हैं।
आज भी ज़रूरी हैं छोटे राज्यों की बहस
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आंबेडकर का छोटा राज्य मॉडल संघवाद और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देता है। इससे न केवल शासन में पारदर्शिता आती है, बल्कि जनता को भी प्रशासन पर निगरानी रखने का अधिकार मिलता है। बाबासाहेब के विचार आज भी भारत की प्रशासनिक संरचना और लोकतांत्रिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।





