जानिए छत्तीसगढ़ में कहां है 12 हाथों वाली महिषासुर मर्दिनी का दरबार

चैतुरगढ़। छत्तीसगढ़ के कश्मीर के नाम से प्रसिद्ध चैतुरगढ़ में 3 हजार फीट की ऊंचाई पर मां महिषासुर मर्दिनी का दरबार है। इस मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में कल्चुरी शासकों ने कराया था। महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति के 12 हाथ हैं, जो गर्भगृह में स्थापित है। 7वीं शताब्दी में वाण वंशीय राजा मल्लदेव ने महिषासुर मर्दिनी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर से 3 किलोमीटर दूरी पर शंकर गुफा स्थित है। यहां किला भी है, जिसे पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है।
किले में तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं, जिनका नाम मेनका, हुमकारा और सिंह द्वार है। छत्तीसगढ़ के 36 किलों में से एक यह भी है। प्रदेश सरकार चैतुरगढ़ को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित कर रही है। यहां प्रदेश के साथ दूसरे राज्यों से भी पर्यटक पहुंचते हैं। जिसके चलते इस साल के नवरात्र में भक्तों को प्रवेश नहीं दिया गया। पर्यटकों के रुकने के लिए विभाग ने पहाड़ के ऊपर एक कॉटेज का निर्माण कराया है। वन मंडल कटघोरा और वन परिक्षेत्र कार्यालय पाली से संपर्क कर कॉटेज में रुक सकते हैं। यहां ट्रैकिंग के लिए भी दर्जनों स्थान हैं। पहाड़ से एक दर्जन से अधिक जलधारा निकलती है।
पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित चैतुरगढ़ मंदिर मैकाल पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियों में से एक है। गर्मी में भी यहां का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होता है। इसीलिए इसे ‘छत्तीसगढ़ का कश्मीर’ कहा जाता है। कोरबा शहर से चैतुरगढ़ करीब लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित है। यह पाली से 40 किलोमीटर उत्तर की ओर समुद्र तल से 3060 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है।
इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां की वास्तुकला भोपाल बैरागढ़ के वास्तु कला से मेल खाती है, जिसे छठी शताब्दी में शिवपुर के महाराजा बाल अर्जुन गुप्त वंश की शाखा, राज्य बैरागढ़ से संबलपुर महानगर शिवपुर की महारानी के द्वारा गजटेड के अनुसार पाली के शिव मंदिर का निर्माण किया गया था, जो लगभग लगभग 1600 साल के पहले की है। पुरातत्वविदों ने इसे मजबूत प्राकृतिक किलो में शामिल किया गया है, चूंकि यह चारों ओर से मजबूत प्राकृतिक दीवारों से संरक्षित है इसलिए केवल कुछ स्थानों पर उच्च दीवारों का निर्माण किया गया है। किले के तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं जो मेनका, हुमकारा और सिम्हाद्वार नाम से जाना जाता है।
पहाड़ी के शीर्ष पर 5 वर्ग मीटर का एक समतल क्षेत्र है, जहां पांच तालाब हैं इनमें से तीन तालाब में पानी भरा है। नवरात्रि पर्व में यहां श्रद्धालुओं का जत्था पूरे प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के श्रद्धालु भी दर्शन करने पहुंचते हैं, और यहां मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करते हैं यहां प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर स्थित है। महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति, 18 हाथों की मूर्ति, गर्भगृह में स्थापित होती है। मंदिर से 3 किमी दूर शंकर की गुफा स्थित है। यह गुफा जो एक सुरंग की तरह है, जो 25 फीट लंबा है। सच्चे मन से जाने वाले ही गुफा के अंदर जा सकता है क्योंकि यह व्यास में बहुत कम है।
चित्तौड़गढ़ की पहाड़ी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं और यह रोमांचक एह्साह का अनुभव प्रदान करती है। कई प्रकार के जंगली जानवर और पक्षी यहां पाए जाते हैं। मंदिर ट्रस्ट ने पर्यटकों के लिए कुछ कमरे भी बनाये। नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष पूजा आयोजित की जाती है। प्रसिद्ध चैतुरगढ़ का किला छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में आता है। इस किले को लाफागढ़ किला नाम से भी जाना जाता है। इस किले का प्राकृतिक महत्व तो है ही लेकिन साथ ही इस किले को वास्तुकला की दृष्टि से देखा जाए तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से चैतुरगढ़ किले को बहुत ही महत्व प्राप्त है। पुरातत्वविद इस किले को एक प्राकृतिक और मजबूत किला मानते है। कुछ का ऐसा भी मानना है मध्य प्रदेश के बैरागढ़ में मिले कुछ शिलालेख बताते है यह किला 933 कलचुरी के ज़माने का है और उस वक्त कलचुरी राजा का शासन था। ऐसा माना जाता है की यहाँ का राजा हैहाया परिवार का था और उसके 18 पुत्र थे। उस राजा के लडको में से एक का नाम कलिंगा था और उस कलिंगा का पुत्र कमला राजा था। कमला राजा ने तुमान पर कई सालो तक शासन किया था। लेकिन कमला राजा को रत्नराजा 1 ने युद्ध में हरा दिया।
वही रत्नराजा के बाद पृथ्वीदेव ने यहां शासन किया। ऐसा कहा जाता है की इस किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव ने करवाया था। भारत का पुरातत्व विभाग इस किले की देखभाल का काम देखता है। प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर भी यही पर है। यहाँ के मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की 18 भुजाओं वाली मूर्ति स्थापित की गयी है। इस मंदिर से 3 किमी की दुरी पर शंकर गुफा है। यह गुफा एक सुरंग की तरह है जो की 25 फूट की है। इस गुफा का आकार बहुत छोटा होने के कारण इसमें से रेंगते हुए ही जाना पड़ता है।
इस चैतुरगढ़ या लाफागढ़ किले की दीवारे एक तरह से ने ना होने के कारण हमें इसकी दीवारे कई जगह पर छोटी तो कई जगह पर मोटी देखने को मिलती है। किले के प्रवेश द्वार बहुत ही खुबसूरत तरीक़े से बनाया गया है। इसमें कई सारे स्तंभ और मुर्तिया भी देखने को मिलती है। यहा पर एक बहुत बड़ी गुबंद है जो मजबूत स्थम्भो पर बनायीं गयी है। इस गुबंद को आधार देने के लिए पाच स्तंभ बनवाये गए थे।
यहां बहुत सारे किले को एक ही नाम दिया जाता है। लेकिन चैतुरगढ़ के किले को एक नहीं बल्कि दो नाम दिए गए है। और यही इस किले की खासियत है। इस किले को चैतुरगढ़ के साथ साथ लाफागढ़ किला नाम से भी जाना जाता है। और सबसे बड़ी चौकाने वाली बात यह है की यह किला इतनी ऊंचाई पर होने के बाद भी इसके सबसे ऊपर के इलाके में एक नहीं बल्की पुरे 5 तालाब है और उनमे से ज्यादातर तालाबो में साल भर पानी भरा रहता है।





