जानिए छत्तीसगढ़ के 5 शक्तिपीठों की क्या है मान्यता?

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में देवी को ग्राम देवी कहा जाता है और शादी-ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर आदर पूर्वक न्योता देने की प्रथा भी है। भुखमरी, महामारी और अकाल को देवी का प्रकोप मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भारत देश में देवी की कुल 51 शक्तिपीठें है, जिनमें से 5 शक्तिपीठ छत्तीसगढ़ में स्थित हैं। वही इन सभी शक्तिपीठों में भक्त हमेशा अपनी मुरादें लेकर आते है और देवी मां उनकी मुरादों को पूरा भी करती है।
छत्तीसगढ़ में अनादि काल से शिव उपासना के साथ – साथ देवी उपासना भी प्रचलित है। छत्तीसगढ़ में पांच प्रमुख शक्तिपीठ है जो पुरे देश, प्रदेश में चर्चित हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में रतनपुर, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी और दंतेवाड़ा शामिल है। रतनपुर में महामाया, चंद्रपुर में चंद्रसेनी, डोंगरगढ़ में बमलेश्वरी और दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी विराजमान हैं। लेकिन अम्बिकापुर में महामाया और समलेश्वरी देवी विराजित हैं और ऐसा माना जाता है कि पूरे छत्तीसगढ़ में महामाया और समलेश्वरी देवी का विस्तार अम्बिकापुर से ही हुआ है। शाक्त धर्म में आदि तत्व को मातृरूप मानने की सामाजिक मान्यता है, उसके अनुसार नारी पूजनीय माने जाने लगी।
शक्ति स्वरूपा मां भवानी छत्तीसगढ़ की अधिष्ठात्री हैं यहां के सामंतो, राजा-महाराजाओं, जमींदारों आदि की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित आज श्रद्धा के केंद्र बिंदु हैं। छत्तीसगढ़ में देवियां अनेक रूपों में विराजमान हैं, श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ इन स्थलों को शक्तिपीठ की मान्यता देने लगी है। प्राचीन काल में देवी के मंदिरों में जवारा बोई जाती थी और अखंड ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती थी जो आज भी अनवरत जारी है।ग्रामीणों द्वारा माता सेवा और ब्राह्मणों द्वारा दुर्गा सप्तमी का पाठ और भजन आदि की जाती है। श्रद्धा के प्रतीक इन स्थलों में सुख, शांति और समृद्धि के लिये बलि दिये जाने की परंपरा है|
रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उसका धड़ अम्बिकापुर में है प्रतिवर्ष वहां मिट्टी का सिर बनाये जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार संबलपुर के राजा द्वारा देवी मां का प्रतिरूप संबलपुर ले जाकर समलेश्वरी देवी के रूप में स्थापित करने की मान्यता प्रचलित है। समलेश्वरी देवी की भव्यता को देखकर दर्शनार्थी डर जाते थे, ऐसी मान्यता है कि देवी मंदिर में पीठ करके प्रतिष्ठित हुई सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में जितने भी देशी राजा-महाराजा हुए उनकी निष्ठा या तो रतनपुर के राजा या संबलपुर के राजा के प्रति थी। ऐसे में मैत्री भाव और अपने राज्य की सुख, समृद्धि और शांति के लिए वहां की देवी की प्रतिमूर्ति अपने राज्य में स्थापित करने शुरू किये जो आज लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं।
चंद्रसेनी या चंद्रहासिनी देवी सरगुजा से आकर सारंगढ़ और रायगढ़ के बीच महानदी के तट पर विराजित हैं। उन्हीं के नाम पर चंद्रपुर नाम प्रचलित हुआ। पूर्व में यह एक छोटी जमींदारी थी, चंद्रसेन नामक राजा ने चंद्रपुर नगर बसाकर चंद्रसेनी देवी को विराजित करने की कहानीभी प्रचलित है। तथ्य जो भी हो, मगर आज चंद्रसेनी देवी अपने नव कलेवर के साथ लोगों की श्रद्धा के केंद्र बिंदु है। नवरात्रि में और अन्य दिनों में भी यहां बलि दिये जाने की प्रथा है। पहाड़ी में सीढ़ी के दोनों ओर अनेक धार्मिक प्रसंगों का शिल्पांकन है , हनुमान और अर्द्धनारीश्वर की आदमकद प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। रायगढ़, सारंगढ़, चांपा, सक्ती में समलेश्वरी देवी की भव्य प्रतिमा है।
दंतेश्वरी मंदिर बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। बस्तर की कुलदेवी दंतेश्वरी देवी हैं, जो यहां के राजा के साथ आंध्र प्रदेश के वारंगल से आयी और शंखिनी डंकनी नदी के बीच में विराजित हुई और बाद में दंतेवाड़ा नगर उनके नाम पर बसायी गयी। बस्तर का राजा नवरात्रि में नौ दिन तक पुजारी के रूप में मंदिर में निवास करते थे। देवी की उनके उपर विशेष कृपा थी। जगदलपुर महल परिसर में भी दंतेश्वरी देवी का एक भव्य मंदिर है। बता दें कि दंतेश्वरी मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ है, जो देशभर में प्रसिद्ध है। यहाँ की कहानी में ये भी प्रचलित है कि यहां माता सती का दांत गिरा था, इसलिए इस मंदिर का नाम दंतेश्वरी और जिले का नाम दंतेवाड़ पड़ा।
राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव में डोंगरगढ़ मंदिर स्थित है। माँ बम्लेश्वरी देवी के मंदिर के लिये विख्यात डोंगरगढ एक ऎतिहासिक नगरी है। यहां माँ बम्लेश्वरी के दो मंदिर है। पहला एक हजार फीट पर स्थित है जो कि बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है। मां बम्लेश्वरी के मंदिर मे प्रतिवर्ष नवरात्र के समय भव्य मेला आयोजित किया जाता है जिसमे लाखो की संख्या मे दर्शनार्थी भाग लेते है। यह चारो ओर हरी-भरी पहाडियों, छोटे-बडे तालाबो एवं पश्चिम मे पनियाजोब जलाशय, उत्तर मे ढारा जलाशय तथा दक्षिण मे मडियान जलाशय से घिरा प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण स्थान है।
खल्लारी माता का मंदिर महासमुंद जिले के खल्लारी गांव की पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भीम और राक्षसी हिडिंबा का विवाह यहीं हुआ था। और तब से इस जगह को भीमखोज के जाता है। खल्लारी माता का मंदिर महासमुंद जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दक्षिण में खल्लारी गांव की पहाड़ी पर स्थित है। माना जाता है कि महाभारत काल में पांडव अपनी यात्रा के दौरान इस पहाड़ी पर आए थे। यहां की पहाड़ी पर भीम के पांव का विशाल पदचिन्ह भी देखने को मिलता है। हर साल चैत्र महीने की पूर्णिमा को यहाँ वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है। क्वांर और चैत्र नवरात्र के दौरान भी बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
प्राचीन समय में इस स्थान को खल्लावाटिका के नाम से जाना जाता था। यह स्थान तात्कालीन हैहयवंशी राजा हरि ब्रह्मदेव की राजधानी थी, और उन्होंने इसकी रक्षा के लिए मां खल्लारी की मूर्ति की स्थापना की थी। एक कहानी के अनुसार महाभारत काल में दुर्योधन ने पांडवों को षड्यंत्रपूर्वक समाप्त करने के लिए जो लाक्षागृह बनवाया था, वह यहीं पर बनवाया था। महासमुंद में चंडी मंदिर भी है, जो महासमुंद से 40 किमी दक्षिण की ओर विकासखण्ड बागबाहरा में घुंचापाली गांव में स्थित है। यहां पश्चिम दिशा की तरफ भीम डोंगा नाम का विशाल पत्थर दिखता है। जिसका एक हिस्सा मैदान की तरफ तो दूसरा हिस्सा गहरी खाई की तरफ झुका हुआ है। एक छोटे पत्थर पर टिका नाव आकृति के इस पत्थर के संतुलन के कारण लोग यहां देखने के लिए आते हैं। यहां पैर की आकृति के बड़े निशान दिखते हैं।





