लालू की दावत-ए-इफ्तार से कांग्रेस का किनारा, गठबंधन में बढ़ती दूरियां?

पटना, 24 मार्च – बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी कड़ी में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) द्वारा आयोजित दावत-ए-इफ्तार से कांग्रेस के बड़े नेताओं की अनुपस्थिति ने सियासी गलियारों में चर्चाओं को जन्म दे दिया है। कांग्रेस पार्टी प्रभारी अल्लावरू कृष्णा और प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार इस आयोजन में शामिल नहीं हुए, जिससे महागठबंधन के भीतर संभावित दरार की अटकलें लगाई जा रही हैं।
लालू-राबड़ी की मौजूदगी, कांग्रेस के बड़े नेता नदारद
आरजेडी की ओर से पूर्व मंत्री अब्दुलबारी सिद्दीकी के सरकारी आवास पर आयोजित इफ्तार पार्टी में पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव समेत कई बड़े नेता शामिल हुए। इस दौरान मुस्लिम संगठनों और महागठबंधन के अन्य सहयोगियों की उपस्थिति देखी गई, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेता नदारद रहे।
केवल विधायक प्रतिमा दास ने निभाई उपस्थिति
जहां कांग्रेस के कई बड़े नेता इस आयोजन से दूर रहे, वहीं पार्टी की विधायक प्रतिमा दास इफ्तार पार्टी में शामिल हुईं। कांग्रेस नेताओं की गैरमौजूदगी से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम आरजेडी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
गठबंधन में बढ़ रही दरार?
आरजेडी और कांग्रेस लंबे समय से बिहार में गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते आ रहे हैं, लेकिन हाल ही में दोनों दलों के बीच बढ़ती खटास को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। कन्हैया कुमार की बिहार कांग्रेस में एंट्री और प्रदेश अध्यक्ष पद से लालू यादव के करीबी अखिलेश सिंह की विदाई के बाद से गठबंधन में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
कांग्रेस की चुनावी रणनीति
बिहार विधानसभा चुनाव से आठ महीने पहले कांग्रेस ने संगठन में बड़े बदलाव किए, जिससे संकेत मिलते हैं कि वह आरजेडी पर सीटों के बंटवारे को लेकर दबाव बना रही है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार आरजेडी उसे उतनी सीटें देने के पक्ष में नहीं दिख रही है।
इफ्तार पार्टियों की राजनीति
बिहार में इफ्तार पार्टियों का राजनीतिक महत्व बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, प्रशांत किशोर और चिराग पासवान सहित कई नेताओं ने इफ्तार पार्टियों का आयोजन किया है। कांग्रेस भी जल्द ही अपना इफ्तार कार्यक्रम आयोजित करेगी।
राजनीतिक समीकरणों के इस बदलाव से साफ है कि बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन में अंदरूनी उठापटक तेज हो सकती है।





