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छत्तीसगढ़ की विभिन्न जगहें : कहीं पर हफ्तेभर पहले मनी होली, तो कहीं 150 साल से नहीं मनाया गया त्योहार

रायपुर। पुरे देश भर में तैयारियां शुरु है… 13 मार्च को होलिका दहन होगा और इसके अगले दिन यानी कि 14 मार्च को पूरे देश में होली का पर्व मनाया जाएगा… ऐसे में अलग- अलग राज्यों में होली को मनाने का अपना- अपना तरीका होते हैं… और कई अलग- अलग तरह के रिवाज भी निभाए जाते हैं..

ऐसे में बारी आती है हमारे छत्तीसगढ़ की… जहां होली की विभिन्न रस्में है.. और सबका अपना एक खास महत्व तो चलिए आज जानेंगे.. उन्हीं रीवाज़ों के बारे में …

इस गांव में एक हफ्ते पहले मनाई जाती है होली

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हमारा छत्तीसगढ़, विभिन्न जनजाति, संस्कृति और रीतियों से भरा राज्य है.. ऐसे में प्रत्येक जनजाति और क्षेत्र का यहां त्योहार मनाने का अपना तरीका है…. लेकिन क्या आज जानते हैं.. जहां पुरा देश 14 और 15 मार्च को होली मनाने वाला है.. वहीं छत्तीसगढ़ के एक गांव में बीते शनिवार को ही होलिका दहन हो गया और रविवार रंग-गुलाल के साथ होली खेली गई.. इस गांव का नाम है सेमरा- सी.. जो कि धमतरी जिले में मौजुद है..बता दें कि ऐसा इस गांव में पहली बार नहीं हुआ है… बल्कि यहां सालों से ऐसा ही रिवाज चला आ रहा है… ग्रामीणों का ऐसा मानना है कि अगर होली के दिन अबीर-गुलाल और रंग खेलते हैं तो गांव में विपदा आ सकती है. इसलिए अनहोनी होने के डर से गांव के लोग हफ्तेभर पहले होली मना लेते हैं… और सिर्फ होली ही नहीं.. यहां लगभग सभी त्योहार हफ्तेभर पहले ही मनाए जाते हैं…

नकारात्मक शक्तियों को बाहर निकालने की जाती है मुर्गी की पुजा

वहीं छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में भी एक गांव ऐसा ही रिवाज़ है… दरअसल यहां जिला मुख्यालय बैकुंठपुर से करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर अमरपुर गांव में होली के 5 दिन पहले ही होली मना ली जाती है.. और त्योहार मनाने से पहले गांव के लोग, मुर्गी का पूजन कर नकारात्मक शक्तियों को गांव से बाहर निकालाते हैं.. इसके बाद त्यौहार मनाते हैं…बता दें कि ये प्रथा सालों से चली आ रही है.. इसे लेकर यहां के लोगों का मानना है कि ग्रामीणों का मानना है कि यदि वे हिंदू पंचांग के अनुसार होली के दिन खुशियां मनाएंगे तो गांव में कोई अप्रिय घटना घट जाएगी..उनका कहना है कि पूर्वजों द्वारा बनाए गए, इस नियम से ही गांव में अप्रिय घटना रुकी हुई है… नहीं तो त्योहार के दिन ही गांव में किसी की मौत हो जाती थी…

तीन गांवो के लोग साथ मनाते हैं होली

इसके अलावा सूरजपुर जिले के ग्राम मोहरसोप, महुली और कछवारी में भी 3 से 5 दिन पूर्व रंगों का त्यौहार मनाने की परंपरा हैं…इसमें बड़ी संख्या में आसपास क्षेत्रों के लोग शामिल होते हैं… ग्रामीण रविवार से ही होली की मस्ती में डूबे हैं. बता दें कि लंबे समय तक महामारी सहित अन्य विपत्तियों का सामना करने के बाद ग्रामीणों ने वर्ष 1960 में 5 दिन पूर्व होली मनाने का निर्णय लिया था…और इसे लेकर ऐसी मान्यता है कि पूर्वजों द्वारा शुरू की गई इस परंपरा से ग्रामीणों को सभी विघ्न-बाधाओं से मुक्ति मिल गई… इस बीच कई बार एक साथ होली मनाने की चर्चा है, लेकिन गांव के बैगा और बुजुर्ग तैयार नहीं हुए… इसके चलते वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार ग्राम मोहरसोप, महुली और कछवारी के ग्रामीण एक ही दिन होली मनाते हैं.

यहां राख से खेली जाती है होली

अब रिवाजों की बात हो ही रही है तो बस्तर संभाग कैसे पीछे रह सकता है.. यहां प्रदेश की सबसे लंबी होली खेली जाती है.. यहां दंतेवाड़ा में 10 दिनों तक होली का त्योहार मनाया जाता है… और फाल्गुन मेले का आयोजन किया जाता है.. इस मेले में विभिन्न राज्यों से देवी देवता शामिल होने आते हैं…  और यहां शक्तिपीठ मां दंतेश्वरी मंदिर में राख से होली खेलने की परंपरा है.. जो करीब 700 साल पुरानी है…  इसके अलावा पुरे 9 दिन देवी मां की पुजा अर्चना की जाती है और 10वें दिन होली खेलती थी… बता दें कि होली पर्व से एक दिन पहले रात में ताड़ के पत्तों से होलिका दहन की परंपरा सिर्फ दंतेवाड़ा में ही निभाई जाती है और होली के दिन सुबह इसी ताड़ के पत्तो के जलने के बाद इसकी राख इकट्ठा कर इससे होली खेली जाती है. इसके अलावा पलाश के फूलों से बनी गुलाल भी देवी देवताओं को चढ़ाई जाती है…

150 साल नहीं खेली गई होली

वहीं अब पुरे प्रदेश में जहां होली की ऐसी धुम है कि हफ्तेभर पहले ही होली का जश्न शुरु हो गया है.. वहीं प्रदेश में कुछ जगहें ऐसी भी है… जहां सालों से होली नहीं खेली गई.. ये गांव, कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है… और यहां के लोगों ने एक अंधविश्वास के चलते लगभग 150 सालों से होली नहीं मनाई..  हैरानी की बात तो ये है कि इस गांव की साक्षरता दर 76% है, फिर भी ग्रामीण बुजुर्गों की बातों का आंख मूंदकर पालन करते आ रहे हैं… यहां के ग्रामीणों का कहना है कि लगभग 150 साल पहले गांव में होली के दिन आग लग गई थी, जिससे काफी नुकसान हुआ था. गांव के लोगों का मानना है कि जैसे ही बैगा ने होलिका दहन की, उसके घर में आग लग गई. आसमान से गिरे अंगारे बैगा के घर पर गिरे और देखते ही देखते आग पूरे गांव में फैल गई…जिसके चलते यहां होली नहीं मनाई जाती…

होली खेलने से देवी होती है नाराज

इसके अलावा गरियाबंद जिले में भी एक ऐसा गांव है जहां 100 सालों से होली नहीं मनाई गई.. ये गांव, मैनपुर तहसील मुख्यालय लगभग 80 किलोमीटर दुर है.. जिसका नाम है खजुरपदर.. यहां के लोग देवी के प्रकोप के चलते यहां होली नहीं मनाते.. दरअसल यहां के लोगों का कहना है कि यहां होली का त्योहार मनाने से देवी नाराज हो जाती है.. उनका प्रकोप बढ़ जाता है… देवी को रंग गुलाल पसंद नहीं है..

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