मेवाड़ परिवार में 42 साल पुराना संपत्ति विवाद अदालत तक पहुँचा

मेवाड़ राजपरिवार में संपत्ति को लेकर विवाद नया नहीं है। इसकी नींव कई दशक पहले महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ के समय पड़ चुकी थी। उस दौर में शाही व्यवस्था धीरे-धीरे आधुनिक भारत के कानून और लोकतांत्रिक ढांचे में ढल रही थी।
भगवत सिंह मेवाड़ के तीन संतानें थीं – बड़े बेटे महेंद्र सिंह, छोटे बेटे अरविंद सिंह और बेटी योगेश्वरी कुमारी। साल 1983 में भगवत सिंह ने पारिवारिक संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का निर्णय लिया, जिसे बड़े बेटे महेंद्र सिंह ने स्वीकार नहीं किया। इसी असहमति ने पारिवारिक रिश्तों में दरार डाली और महेंद्र सिंह ने अपने पिता के फैसले को अदालत में चुनौती दी।
इसके बाद भगवत सिंह ने संपत्ति और ट्रस्ट प्रबंधन के अधिकार धीरे-धीरे छोटे बेटे अरविंद सिंह को सौंपने शुरू कर दिए। 3 नवंबर 1984 को भगवत सिंह के निधन के बाद विवाद खुलकर सामने आया और वसीयत, ट्रस्ट और संपत्ति के अधिकार को लेकर अदालतों में याचिकाएं दाखिल होने लगीं।
लगभग साढ़े तीन दशकों तक मामला अलग-अलग अदालतों में चलता रहा। साल 2020 में उदयपुर जिला अदालत ने संपत्तियों को चार हिस्सों में बांटने का आदेश दिया, लेकिन उच्च अदालतों में अपील और स्थगन आदेशों के कारण यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका।
आज इस विवाद में नई पीढ़ी शामिल है। अरविंद सिंह मेवाड़ के बाद अब भाई-बहन लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ और पद्मजा कुमारी परमार के बीच सिटी पैलेस, एचआरएच ग्रुप ऑफ होटल्स और अन्य संपत्तियों के अधिकार को लेकर टकराव सामने आया है।
सिटी पैलेस केवल महल नहीं, बल्कि मेवाड़ की पहचान, गौरव और परंपरा का प्रतीक है। लेक पिछोला में स्थित जग निवास और अन्य महल आज हेरिटेज होटल के रूप में संचालित होते हैं, जिनसे करोड़ों रुपये का राजस्व आता है।
मेवाड़ परिवार की संपत्तियों का कुल मूल्य हजारों करोड़ रुपये में आंका जाता है। जनवरी 2026 में सभी याचिकाओं को दिल्ली हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया गया, ताकि अलग-अलग मामलों को एक मंच पर सुनवाई के लिए लाया जा सके।
यह विवाद केवल कानूनी दस्तावेजों तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों की नाराजगी, टूटे रिश्ते और अधूरी संवाद की कहानियां भी इसके पीछे छिपी हैं। शाही परिवार आज अलग-अलग अदालतों में अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।





