अरपा मैय्या की बदहाली: किसकी जिम्मेदारी…

बिलासपुर
बिलासपुर की जीवनरेखा मानी जाने वाली अंतःसलिला अरपा नदी आज अपने ही शहर में उपेक्षा का शिकार है। कभी आस्था, परंपरा और जल-संस्कृति की प्रतीक रही यह नदी अब सूखते जल, चोरी होती रेत और दम तोड़ती उम्मीदों की कहानी बन चुकी है।

हर चुनाव में अरपा को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। कभी कहा गया कि इसे लंदन की टेम्स की तरह विकसित किया जाएगा, कभी इसका सौंदर्यीकरण और बारहमासी जल प्रवाह सुनिश्चित करने की योजनाएं बनाई गईं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से बिलकुल उलट है।

वादों की नदी, हकीकत की सूखी धार
बीते सालों में राज्य की सत्ता में दोनों प्रमुख दलों की सरकारें रहीं। योजनाएं आईं, घोषणाएं हुईं, लेकिन अरपा की दशा जस की तस है। सवाल ये उठता है कि आखिर अरपा की बदहाली की वास्तविक वजह क्या है?

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार, इसके पीछे कई कारक ज़िम्मेदार हैं:
रेत माफियाओं का दबदबा – अवैध रेत खनन ने नदी की गहराई और जैवविविधता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
प्रशासनिक उदासीनता – घोषित योजनाएं कागज़ों में ही सीमित रहीं, ज़मीनी कार्य या तो अधूरे हैं या शुरू ही नहीं हो पाए।
वित्तीय संकट – केंद्र और राज्य के बीच फंड के बंटवारे और उपयोग को लेकर स्पष्टता का अभाव दिखता रहा है।
जनजागरूकता की कमी – आम लोगों में अरपा को लेकर संवेदनशीलता और सक्रियता की कमी ने भी इसके पुनर्जीवन को मुश्किल बना दिया है।

अरपा – आस्था से अस्तित्व तक
अरपा सिर्फ एक नदी नहीं, बिलासपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर है। इसके तट पर बसे मंदिर, मेले और धार्मिक आयोजन इस बात की गवाही देते हैं कि यह सिर्फ जलधारा नहीं, एक आस्था की धारा भी रही है। लेकिन आज यह नदी अपनी पहचान खोती जा रही है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या बचा पाएंगे अरपा?
अब जब अरपा की स्थिति एक संकट की ओर बढ़ रही है, तो यह जरूरी हो गया है कि हम यह सवाल खुद से पूछें –
क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सूखी, बंजर और उपेक्षित नदी विरासत में देना चाहते हैं?

नदी को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक – सबको मिलकर इस पर सोचने और कार्रवाई करने की जरूरत है।

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