आतंक का नया चेहरा! 33 साल में 42 बड़े हमले, देश ने कैसे झेला आतंकवाद का दंश

दिल्ली। भारत पिछले चार दशकों से आतंकवाद की लंबी और पीड़ादायक लड़ाई लड़ रहा है। 1993 से 2025 तक के 33 वर्षों में देश 42 बड़े आतंकी हमलों का दंश झेल चुका है।

कभी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन भारत की सरजमीं पर खून की होली खेलते रहे, तो कभी स्थानीय नेटवर्क के जरिए आतंकी वारदातों को अंजाम दिया गया। इस पूरे दौर में यह माना जाता था कि आतंकवाद में शामिल लोग अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर और आसानी से भटकाए जा सकने वाले होते हैं, लेकिन हाल ही में दिल्ली के लालकिला विस्फोट ने आतंक के नए और अधिक खतरनाक चेहरे को उजागर किया है।

लालकिला हमले में सामने आए आतंकी किसी कट्टर संगठन के सदस्य नहीं बल्कि उच्च शिक्षित मेडिकल प्रोफेशनल थे—एमबीबीएस और एमडी जैसे डिग्रीधारी युवक, जिन्होंने अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल मानवता के खिलाफ किया। आत्मघाती हमलावर के रूप में ऐसे पेशेवरों का सामने आना सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती है। यह स्पष्ट संकेत है कि आतंकवाद अब विचारधारा, रणनीति और नेटवर्क तीनों स्तरों पर बदल चुका है।

1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट से लेकर 2001 के संसद हमले, 2006 मुंबई ट्रेन धमाके, 2008 के 26/11 हमलों, 2019 पुलवामा अटैक और हाल के 2025 पहलगाम व लालकिला विस्फोट तक, आतंकवाद ने देश को बार-बार लहूलुहान किया। इन हमलों में हजारों निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई और सैकड़ों परिवार उजड़ गए।

अब आतंक का यह विकसित और शिक्षित रूप संकेत देता है कि सुरक्षा तंत्र को केवल सीमाई घुसपैठ पर ही नहीं, बल्कि समाज में छिपी उस कट्टर विचारधारा पर भी नजर रखनी होगी, जो युवा दिमागों को भ्रमित कर चरमपंथ की ओर धकेल रही है। आतंक के इस नए चेहरे को पहचानना और तोड़ना ही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती है।

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