156 साल बाद थमेगा रॉयल ट्रेन का सफर, ब्रिटेन में खत्म हो रही एक शाही परंपरा

लंदन:ब्रिटेन की शाही परंपरा और भव्यता की प्रतीक रही रॉयल ट्रेन अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। 156 वर्षों से राजपरिवार के गौरवशाली इतिहास की साक्षी रही यह ट्रेन अब रिटायर होने जा रही है। 1869 में महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में शुरू हुई यह ट्रेन न सिर्फ शाही यात्राओं का साधन रही, बल्कि ब्रिटेन की सांस्कृतिक और तकनीकी विरासत का भी अहम हिस्सा थी।

रॉयल ट्रेन की शुरुआत महारानी विक्टोरिया के आदेश पर हुई थी, जिसे खासतौर पर उनकी सुरक्षा, गोपनीयता और राजसी गरिमा के अनुरूप तैयार किया गया था। शुरू में भाप इंजन से चलने वाली इस ट्रेन के डिब्बे कीमती लकड़ी, शाही प्रतीकों और हस्तशिल्प कलाकृतियों से सुसज्जित थे। इसमें शाही रसोई, डाइनिंग रूम, बेडरूम और बाथरूम जैसी सुविधाएं थीं, जो इसे चलते-फिरते महल का रूप देती थीं।

शाही परिवार के अधिकांश सदस्य—महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय, प्रिंस चार्ल्स (अब किंग चार्ल्स III) सहित—इस ट्रेन का भरपूर उपयोग करते रहे। शाही यात्राओं, समारोहों और राष्ट्रव्यापी अभियानों में इस ट्रेन की भूमिका बेहद अहम रही। खासकर 1977 की सिल्वर जुबली यात्रा के दौरान इस ट्रेन ने पूरे देश में शाही गरिमा का प्रतीक बनकर लाखों लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी थी।

हालांकि, इस ट्रेन का संचालन अत्यधिक खर्चीला था। हर साल इसके रखरखाव, सुरक्षा, तकनीकी उन्नयन और स्टाफ वेतन पर करोड़ों पाउंड खर्च होते थे, जो ब्रिटिश टैक्सपेयर्स की जेब से आता था। समय के साथ बढ़ती आलोचनाओं और महंगे खर्च के चलते किंग चार्ल्स III ने इसे रिटायर करने का निर्णय लिया।

अब शाही परिवार पर्यावरण-अनुकूल और किफायती यात्रा विकल्पों की ओर अग्रसर हो रहा है। रॉयल ट्रेन का सफर भले ही थम रहा हो, लेकिन इसकी भव्य विरासत संग्रहालयों और इतिहास में सदा जीवित रहेगी। यह सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि ब्रिटेन की शाही गरिमा और परंपरा का चलता-फिरता प्रतीक रही है।

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