बस्तर की आदिवासी संस्कृति में वाद्ययंत्रों की भूमिका…

बस्तर
जहाँ सुरों की थाप से परंपरा बोलती है.. जहाँ हर ताल में इतिहास धड़कता है.. और जहाँ वाद्ययंत्र सिर्फ वादन नहीं, भावना हैं… पहचान हैं… आस्था हैं।
बस्तर की संस्कृति में वाद्ययंत्रों की भूमिका इतनी गहराई से जुड़ी है कि इनके बिना कोई भी संस्कार, कोई भी पूजा, कोई भी उत्सव अधूरा माना जाता है।
बिना वाद्ययंत्र के न तो शादी की रस्में होती हैं और न ही पूजा-पाठ। देवी-देवताओं को मनाने से लेकर छठी के कार्यक्रम तक वाद्ययंत्र बेहद जरूरी हैं। यहां तक कि मेला-मड़ई में नाच-गान के लिए ढोल-मांदर बहुत महत्वपूर्ण है।

खास बात है कि हर एक परंपरा के लिए अलग-अलग तरह के वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा-पाठ और देवी-देवताओं की आराधना के लिए जिन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है उसका उपयोग शादी या फिर नाच-गान के लिए नहीं होता है।
तो चलिए आपको लिए चलते हैं बस्तर की उस मधुर यात्रा पर जहाँ हम आपको बताएँगे बस्तर के अलग अलग वाद्ययंत्रों के बारे में

जब देवी-देवताओं की आराधना होती है ध्वनि से…
बस्तर के आदिवासी समाज में यह परंपरा है कि हर अवसर पर अलग-अलग वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं।
पूजा-पाठ के लिए जो वाद्ययंत्र बजते हैं, वे कभी शादी या नृत्य में इस्तेमाल नहीं किए जाते।
और यही बात बस्तर की संस्कृति को विशिष्ट बनाती है।
सबसे पहले बात करते हैं नगाड़े की।
नगाड़ा – यह कोई साधारण वाद्ययंत्र नहीं है।
यह एक ऐसी थाप है, जिससे देवता जागते हैं… जिससे प्रकृति झूमती है…यह बैल की खाल से बनाया जाता है और इसे बजाने की एक विशिष्ट विधि होती है।
एक जोड़ा होता है – एंड्रा और माई – एक को पुरुष और दूसरे को स्त्री का स्वरूप माना जाता है।
इनके साथ बजाई जाती है मोहरी – एक ऐसी बांसुरी, जो पतली नहीं, बल्कि मोटी और गंभीर स्वर देती है।यह लकड़ी और पीतल-तांबे से बनी होती है और जब यह बजती है, तो लगता है जैसे जंगल की आत्मा गा रही हो।
फिर आता है तोढ़ी – एक शंख के आकार का वाद्य, जो पीतल से बना होता है।और पूजा की शुरुआत में इसका उपयोग होता है।
तुड़भूड़ी – यह छोटा सा नगाड़ा होता है, जिसे एक हाथ में पकड़कर और दूसरे हाथ से लकड़ी से बजाया जाता है।
यह नगाड़े के साथ ताल मेल बनाकर पूजा के समय माहौल को आध्यात्मिक बना देता है।
जब शादी की रस्मों को थाप मिलती है…
अब ज़रा सोचिए… बिना ढोल की थाप के क्या कोई शादी की बारात पूरी लगती है?
बस्तर में जब शादी होती है, तो वहां बजता है ढोल – पर यह कोई आम ढोल नहीं है।
यह विशेष रूप से बड़ा होता है और इसमें एक तरफ बकरे की खाल और दूसरी तरफ बैल की खाल लगी होती है।
इसके साथ-साथ छोटी मोहरी बजाई जाती है, जो मोहरी का छोटा रूप होती है – शादी के रीति-रिवाज़ों की रफ्तार और उत्साह को बढ़ा देती है।
शादी में कभी-कभी टामक का भी इस्तेमाल होता है – यह एक सिंगल नगाड़े जैसा वाद्ययंत्र है, जो ढोल की थाप में थिरकता है।
मेला-मड़ई और नृत्य में जो थाप गूंजती है…
बस्तर की असली रंगत दिखाई देती है उसके मेलों में, मड़ई में, लोकनृत्य में।और इन सबके केंद्र में होते हैं नृत्य वाद्ययंत्र।
सबसे पहले बात करें कुट्टा मांदरी की – जो विशेष रूप से अबूझमाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में बजाया जाता है।
यह वाद्य लकड़ी और बैल की खाल से बना होता है, एक तरफ छोटा और दूसरी ओर बड़ा।एक तरफ हाथ से और दूसरी तरफ लकड़ी से बजाया जाता है।
दूसरी ओर कोटोड़का – यह पूरी तरह लकड़ी का बना होता है, जिसमें एक छोटा होल होता है।इसे कमर से लटकाया जाता है और दो छोटी लकड़ियों से बजाया जाता है।यह सिर्फ शादी में मांदर के साथ बजाया जाता है।
और अब बात करें सबसे खास वाद्य की — गौर नाचा ढोल की।
यह बस्तर की पहचान है। 5 से 6 फीट लंबा ढोल, जो गौर नृत्य के दौरान बजाया जाता है। इसमें पहनते हैं गौर के सींग से बना मुकुट, और जब ये नृत्य शुरू होता है —तो पूरी धरती जैसे थिरकने लगती है!
बस्तर पंडुम में दिखा सुरों का संगम
हाल ही में हुए बस्तर पंडुम महोत्सव में इन पारंपरिक वाद्ययंत्रों की शानदार झलक देखने को मिली। छत्तीसगढ़ में आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करने के लिए बस्तर पंडुम का आयोजन किया गया। जहाँ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विजेताओं को पुरस्कृत किया। इसी दौरान
आदिवासी वाद्य यंत्र श्रेणी में कोयलीबेड़ा ब्लॉक के प्रतिभागियों ने प्रथम स्थान हासिल किया।
बस्तर के इन वाद्ययंत्रों को सुनना सिर्फ एक संगीत नहीं, बल्कि एक पीढ़ियों से चलती आ रही परंपरा को महसूस करना है।
यहां हर थाप में एक कहानी है… हर धुन में एक परंपरा है…और हर वाद्ययंत्र में बस्तर की आत्मा बसती है। इन वाद्ययंत्रों की गूंज ही है जिसने बस्तर की संस्कृति को आज तक जीवित रखा है। और जब तक ये थापें हैं, तब तक बस्तर की परंपरा भी अमर रहेगी।





