प्रोजेक्ट-75I: भारतीय नौसेना के लिए गेमचेंजर, 6 उन्नत AIP पनडुब्बियों से बढ़ेगी समुद्री ताकत

नई दिल्ली। भारतीय नौसेना के लिए प्रोजेक्ट-75I को एक बड़ा और रणनीतिक रूप से अहम कदम माना जा रहा है। इस परियोजना के तहत भारत में ही 6 अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी, जिनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक होगी। यह तकनीक पनडुब्बियों को लंबे समय तक बिना सतह पर आए पानी के नीचे रहने में सक्षम बनाती है, जिससे उनकी स्टेल्थ क्षमता काफी बढ़ जाती है।
सूत्रों के मुताबिक, इस परियोजना में जर्मनी की टाइप-214NG पनडुब्बी को स्पेन की S-80 प्लस पर प्राथमिकता दी गई है। इसकी वजह इसका परखा हुआ फ्यूल-सेल आधारित AIP सिस्टम, बेहतर साइलेंस तकनीक और कम तकनीकी जोखिम माने जा रहे हैं। समुद्र के नीचे युद्ध में कम शोर और भरोसेमंद प्रदर्शन को सबसे अहम माना गया है।
प्रोजेक्ट-75I के तहत सभी 6 पनडुब्बियों का निर्माण भारत में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में किया जाएगा। जर्मनी की कंपनी थायसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स डिजाइन और तकनीकी सहयोग देगी। शुरुआती चरण में पनडुब्बियों में लगभग 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होगी, जिसे अंतिम पनडुब्बी तक बढ़ाकर करीब 60 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार का कहना है कि यह सिर्फ पनडुब्बी खरीदने की योजना नहीं है, बल्कि देश में पनडुब्बी निर्माण की मजबूत क्षमता विकसित करने और महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक हासिल करने की दिशा में कदम है। इससे भविष्य में पूरी तरह स्वदेशी पनडुब्बियां बनाने का रास्ता खुलेगा।
इस परियोजना की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि भारत की मौजूदा पारंपरिक पनडुब्बी फ्लीट धीरे-धीरे पुरानी हो रही है, जबकि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की पनडुब्बी गतिविधियां बढ़ रही हैं। चीन की परमाणु पनडुब्बियों की मौजूदगी और पाकिस्तान को मिल रही चीनी मदद भारत के लिए रणनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, नई पनडुब्बियां समुद्री चोक-पॉइंट्स की निगरानी, दुश्मन पनडुब्बियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर समुद्र से रोकथाम जैसे अभियानों में अहम भूमिका निभाएंगी। 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के बाद यह साफ हुआ कि मजबूत नौसैनिक शक्ति एक बड़ा रणनीतिक दबाव बन सकती है।
जर्मनी के साथ यह सहयोग केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि यह योजना समय पर पूरी होती है, तो यह भारत की समुद्री ताकत, स्वदेशी रक्षा उद्योग और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।





