नगर सेना की महिलाओं को मातृत्व अवकाश नहीं, नो वर्क-नो पेमेंट में मजबूर

राज्य बनने के 25 साल बाद भी नगर सेना में पदस्थ महिला कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। उन्हें 6 माह का मातृत्व अवकाश अभी तक नहीं मिला है, जबकि यह केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकार है।
इस अधिकार को लागू करने के लिए कई प्रस्ताव भेजे गए, लेकिन वित्त विभाग की अनुमति न मिलने के कारण फाइलें वापस लौटा दी गईं। नतीजतन, महिला कर्मचारियों को बच्चों की देखभाल के लिए नो वर्क-नो पेमेंट का विकल्प अपनाना पड़ता है।
राज्य गठन के बाद 2000 में नगर सेना का गठन हुआ। वर्तमान में राज्य में करीब 9 हजार नगर सेना कर्मचारी पदस्थ हैं, जिनमें लगभग 2600 महिलाएं हैं। कई महिलाओं को डिलीवरी के बाद केवल दो माह की छुट्टी मिलती है और बाकी समय बिना वेतन घर पर रहना पड़ता है। यह स्थिति कोरबा और बिलासपुर में पदस्थ अन्य महिला कर्मचारियों पर भी लागू है।
मातृत्व अवकाश केवल सुविधा नहीं, बल्कि महिला का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे जीवन के मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। केंद्र सरकार ने 2017 में मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 को संशोधित किया, जिसके अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को 180 दिन का भुगतान योग्य मातृत्व अवकाश मिलता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नगर सेना की महिलाएं कानून-व्यवस्था संभालते हुए भी अपने जीवन की सबसे जरूरी घड़ी में इस अधिकार से वंचित हैं। मातृत्व अवकाश महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और समान अधिकारों से जुड़ा है, लेकिन नगर सेना में यह अब तक लागू नहीं हो पाया है।




