15 हजार नहीं देने पर निजी अस्पताल में मां और नवजात को 6 दिन तक रोके रखा

गरियाबंद जिले के एक निजी अस्पताल में मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है, जहां प्रसव के बाद एक महिला और उसके नवजात को बिल का भुगतान न करने पर कई दिनों तक अस्पताल में रोके रखा गया। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार से 15 हजार रुपए की मांग की गई थी, जिसे न चुका पाने पर मां और बच्चे को बाहर जाने नहीं दिया गया।
मैनपुर क्षेत्र की रहने वाली नवीना चींदा को प्रसव पीड़ा होने पर धर्मगढ़ स्थित एक निजी क्लिनिक में भर्ती कराया गया था। वहां सामान्य प्रसव के बाद एक बच्ची का जन्म हुआ। भर्ती के समय परिवार ने 5 हजार रुपए जमा किए थे, लेकिन इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने 20 हजार रुपए का बिल बनाकर शेष 15 हजार रुपए की मांग की।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण तत्काल राशि का इंतजाम नहीं हो सका। नवीना की सास पैसे जुटाने के लिए गांव लौट गई, जबकि मां, नवजात और एक अन्य बच्चा अस्पताल में ही फंसे रहे। करीब छह दिनों तक उन्हें अस्पताल में ही रखा गया और बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई।
मामले की जानकारी मीडिया को मिलने के बाद अस्पताल प्रबंधन पर दबाव बना। इसके बाद मां और नवजात को एंबुलेंस के जरिए उनके गांव भेजा गया। जिला पंचायत अध्यक्ष की पहल पर मामले में हस्तक्षेप किया गया और पीड़ित परिवार को राहत दिलाई गई।
परिजनों ने बताया कि नवीना के पति मजदूरी के लिए बाहर काम करते हैं और परिवार की आय का कोई स्थायी साधन नहीं है। पहले प्रसव में भी उन्हें भारी राशि चुकानी पड़ी थी, जिसके लिए गहने तक बेचने पड़े थे। इस बार भी परिवार कर्ज और गरीबी के कारण रकम नहीं जुटा सका।
अस्पताल संचालक ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें परिवार की आर्थिक परेशानी की जानकारी नहीं थी और स्टाफ ने पूरा ध्यान रखा। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने मामले की जांच कराने की बात कही है।
यह मामला सामने आने के बाद सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। विशेष पिछड़े जनजाति से जुड़े इस परिवार को कई सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाया, जिससे उनकी स्थिति और कमजोर हो गई। प्रशासन ने पूरे प्रकरण की जांच कर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।





