.देश दुनिया में आस्था और ग़म के साथ मनाई गई मोहर्रम की दसवीं, छत्तीसगढ़ में भी ताजिए और मातमी जुलूस निकले..

इस्लामी नववर्ष के पहले महीने मोहर्रम की दसवीं तारीख को पूरे देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में भी गमगीन माहौल के बीच यौम-ए-आशूरा मनाया गया। इस मौके पर विभिन्न स्थानों पर ताजिए निकाले गए और मातमी जुलूसों के जरिए कर्बला के शहीदों को याद किया गया।

बिलासपुर

छत्तीसगढ़ में सुबह से जारी भारी बारिश के बावजूद मुस्लिम समुदाय के लोग इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते नज़र आए। मुस्लिम घरों में नमाज, दरूद फातिहा के अलावा कुरान शरीफ की तिलावत की जाती रही।

लोगों ने इस मौके मोहर्रम की नवमी और दशमी का रोजा भी रखा। बिलासपुर में ताजिए के साथ-साथ ईरानी समुदाय द्वारा भी पारंपरिक मातमी जुलूस निकाला गया, जिसमें या हुसैन की सदाएं गूंजती रही।
दिनभर शहर के अलग-अलग इलाकों में लंगर का आयोजन किया गया, जहां सभी धर्मों और समुदायों के लोगों ने इसे प्राप्त किया। यह अवसर इंसानियत, एकता और बलिदान की भावना को समर्पित रहा।
जहां एक ओर मातम और श्रद्धा का माहौल रहा, वहीं दूसरी ओर हर धर्म के लोगों ने ताजिए और लंगर में सहभागिता कर सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल पेश की। जैसे जैसे शाम से रात होती गई वैसे वैसे अलग अलग वार्ड मोहल्लों से सजे धजे ताजिये गोलबाजार की ओर रुख करते नजर आए। विभिन्न इमामबाड़ों से सवारियां भी उठी जो शहर का गस्त करते रहे। मानसूनी मौसम के बावजूद हर तरफ मोहर्रम की दसवीं मनाने लोगों की तैयारियां सुबह से ही दिखाई देती रही। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन ने चाक-चौबंद इंतजाम किए थे। पुलिस बलों की तैनाती और ट्रैफिक व्यवस्था के साथ-साथ नगर निगम की टीम भी सफाई व्यवस्था में जुटी रही।

यौम-ए-आशूरा केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि हक़ और इंसाफ़ के लिए दी गई कुर्बानी का प्रतीक है। इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर अमन और इंसानियत के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यही संदेश हर साल मोहर्रम की दसवीं को याद दिलाता है।

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