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कहां हुआ था महर्षि मार्कंडेय का जन्म, यहां है उनकी तीर्थ स्थली

बिलासपुर: बिलासपुर मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर महर्षि मार्कंडेय मंदिर स्थित हैं। मंदिर के ऊपर व्यास गुफा भी स्थित हैं। इस मंदिर को ऋषि मार्कंडेय का जन्म स्थान भी माना जाता है। पौराणिक गाथा के अनुसार मृकुंडु ऋषि की घोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें पुत्र रत्न का वरदान दिया था। लेकिन वरदान के साथ उन्होंने पुत्र के अल्पायु होने का भी जिक्र कर दिया। जैसे-जैसे पुत्र की आयु बढ़ती गई, पिता चिंताग्रस्त रहने लगे।

 

उनके पुत्र बालक मार्कंडेय कुशाग्र बुद्धि होने के साथ पितृभक्त भी थे। उन्होंने अपने पिता के मन को कुरेद कर चिंता का कारण जान लिया। और इस चिंता से मुक्ति के लिए भगवान् शिव की तपस्या शुरू कर दी। जब उनकी आयु 12 साल होने में केवल 3 दिन शेष रह गए, तब उन्होंने रेत का एक शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की तपस्या में लीं हो गए। यम दूत उनके प्राण हरण करने के लिए आए, लेकिन उन शिव लिंग में से आग की लपटें निकली और यमदूतों की ओर बढ़ने लगी।

 

जिसके बाद यमदूत ने हारकर यमराज को सारा हाल सुनाया। स्वयं यमराज जब वहां आए तो मार्कंडेय ने शिवलिंग को बांहों में पकड़ लिया। शिवलिंग में से शिव प्रकट हुए और उन्होंने यमराज को वापस यमपुरी जाने का आदेश दिया। उस स्थान पर पानी का झरना फुट पड़ा, जिसे आज मार्कंडेय तीर्थ के नाम से जाना जाता है। मरणासन्न व्यक्ति की प्राणरक्षा में समर्थ महामंत्र ‘महामृत्युंजय’ की ख्याति मार्कण्डेय के ही कारण है। इस मंत्र पर लोक आस्था इतनी अधिक है कि वैदिक मंत्र होने के बावजूद महामृत्युंजय मंत्र मार्कण्डेय रचित माना जाता है। मार्कण्डेय इतने महान ऋषि हैं कि उनकी उपस्थिति भगवान श्रीराम के युग से पहले, श्रीराम कथा में , जो महाभारत काल तक मौजूद रहे। मार्कण्डेय पुराण इन्हीं की रचना है, जिसका एक अंश वह दुर्गासप्तशती है, जिसका नवरात्र में श्रद्धा से पारायण किया जाता है।

 

माना जाता है कि मार्कण्डेय का जन्मस्थान वही है, जहाँ आज मार्कंडेय तीर्थ मंदिर स्थित है। शास्त्रों के अनुसार, मार्कण्डेय का निवास प्लक्ष-प्रसार वी नामक क्षेत्र में था, जहाँ सरस्वती नदी की धारा प्रकट हुई थी। बिलासपुर में मार्कंडेय मंदिर को ऋषि मार्कण्डेय का जन्मस्थान भी माना जाता है। मंदिर के पास ही एक झरना है, जिसे मार्कंडेय तीर्थ के रूप में जाना जाता है।

 

मार्कंडेय के जन्म से पहले, उनके पिता मृकंड ऋषि ने घोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र वरदान दिया था। मार्कण्डेय की मृत्यु यमराज के आने से पहले ही हो गई थी, क्योंकि उन्होंने शिवलिंग की पूजा जारी रखी थी। यमराज के दूत उनके जीवन को लेने में असमर्थ थे। मार्कण्डेय का संबंध सरस्वती नदी से भी है, जो उनके निवास स्थान के पास बहती थी। पुराणों में उल्लेख है कि सरस्वती नदी उस युग में लगभग लुप्त हो गई थी।

 

हम में से बहुत से लोगो ने मार्कण्डेय ऋषि का नाम सुना है हिंदू धर्म के पुराणों में मार्कण्डेय ऋषि का पुराण सबसे उत्तम और प्राचनीतम माना जाता है। इस पुराण में ऋग्वेद की भांति अग्नि, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं पर विस्तृत कथा है है और गृहस्थाश्रम, दिनचर्या, नित्यकर्म आदि की भी चर्चा है। भगवती की विस्तृत महिमा का परिचय देने वाले इस पुराण में दुर्गासप्तशती की कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्र की कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूया की कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुंदर कथाओं का विस्तृत वर्णन है।

 

मार्कंडेय ऋषि को हिंदू धर्म में खास स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के पुराणों में मार्कंडेय ऋषि का पुराण सबसे उत्तम और प्राचनीतम माना जाता है। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुरसे लगभग 20 किलोमीटर दूर मार्कंडेय ऋषि को समर्पित धार्मिक स्थल है। इस जगह को मार्कंडेय ऋषि की तपोस्थली भी माना जाता है। मार्कंडेय ऋषि मंदिर में दर्शन करने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मार्कंडेय ऋषि मंदिर के पास एक झरना है, जिसे बेहद पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस झरने में स्नान किए बिना चार धाम की यात्रा अधूरी रहती है। झरने के पानी में औषधीय गुण पाए जाते हैं।

 

धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। जब मर्कण्डु ऋषि को कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रकट हुए भगवान शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने कहा कि उन्हें अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

 

महाभारत के अनुसार- मार्कण्डेय ने हज़ार-हज़ार युगों के अंत में होने वाले अनेक महाप्रलय देखे हैं महाकाव्य में इस महामुनि को अजर-अमर कहा गया है। महाभारत में लिखा है कि जब मार्कण्डेय वनवास अवधि में युधिष्ठिर सहित सभी पाण्डवों से मिलने पहुंचे तब- वे रूप और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न तथा अजर-अमर थे। वैसे बड़े-बूढ़े होने पर भी वे ऐसे दिखाई देते थे, मानो पच्चीस वर्ष के तरुण हों! महर्षि मार्कण्डेय को पुराणों में अष्ट चिरंजीवियों में एक माना गया है।

 

बता दें अश्वत्थामा, दैत्यराज बली, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि सदैव जीवित हैं। इनका स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु प्राप्त करता है। इन सबमें भी अकेले मार्कण्डेय हैं जो ब्रह्माजी को छोड़ आयु में शेष सभी से बड़े हैं। आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण के अनुसार मार्कण्डेय महाराज दशरथ के ऋत्विज थे और भगवान श्रीराम के विवाह में बराती बन मिथिला गए थे।

 

रामायण के बालकाण्ड के श्लोक के अनुसार वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, दीर्घजीवी मार्कण्डेय तथा कात्यायन सभी ब्रह्मर्षि थे और इनका रथ दशरथ के रथ के आगे-आगे चलकर राम के विवाह में अयोध्या से मिथिला पहुंचे थे। दशरथ की मृत्यु होने पर दूसरे दिन प्रातःकाल राजसभा पहुंचकर इन्होंने ही वसिष्ठ को दूसरा राजा नियुक्त करने का परामर्श दिया था। श्रीराम के आमंत्रण पर ये उनकी सभा में पधारे थे और राम ने इनका सत्कार किया था। इतना ही नहीं, मार्कण्डेय सीता के रसातल में प्रवेश के भी साक्षी बने थे। इस प्राचीन मंदिर के बारे में हमारी ये जानकारी आपको कैसी लगी, हमें कमेंट करके जरूर बताएं और वीडियो को लाइक और शेयर करें, ताकि ऐसी ही धार्मिक और प्राचीन मंदिरों की ख़बरों से हम आपको आगे भी अपडेट रख सकें।

 

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