जानिए छत्तीसगढ़ में कहां है, मधुमक्खियों की देवी भ्रामरी का मंदिर?

गंडई। भंवरदाह मां भ्रामरी देवी मंदिर, जो छत्तीसगढ़ के गंडई जिले से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मैकल पर्वत की ऊँची चट्टानों और सुराही नदी की शांत धारा के बीच घने जंगलों में ये मंदिर स्थापित है। बता दें यहां कोई मंदिर नहीं है बल्कि एक पीपल के पेड़ के नीचे माता भ्रामरी देवी विराजमान हैं। जिनके दरबार में हजारों मधुमक्खियों के छत्ते हैं। ग्रामीण मधुमक्खियों को देवी मां की जीवित उपस्थिति मानते हैं।

यहां की मान्यता है कि जब राक्षसों ने पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था और मनुष्यों का संहार कर रहे थे, तब माता भ्रामरी ने अपने शरीर से हजारों मधुमक्खियां उतपन्न की और उस राक्षस का वध किया, जिसके बाद से माता भ्रामरी को मधुमक्खियों की देवी के रूप में पूजा जाने लगा। इस जगह पर आज भी प्राकृतिक रूप से हजारों मधुमक्खियों के छत्ते मौजूद हैं, जो यहां माता के होने का साक्षात उदहारण देते हैं।

भंवरदाह पहुंचने के लिए गंडई से भरभरी डैम होते हुए तक़रीबन 2 से 3 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है, जी पगडंडी और ऊबड़खाबड़ रास्तों से होकर गुजरता है। यहां तक पहुंचने के लिए दो बार नदी पार करनी पड़ती हैं। वही माता भ्रामरी के दरबार में पहुंचते ही यह सफर आध्यात्मिकता में बदल जाता है। बता दें इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन किसी विशेष अनुभूति से कम भी नहीं हैं।

भंवरदाह ना केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आत्मा की उस यात्रा का प्रारम्भिक बिंदु है, जहां भक्ति, प्रकृति और इतिहास का अनुभव एक साथ मिलता है। अगर आप भी कभी यात्रा पर जाना चाहे तो एक बार भंवरदाह जरूर आएं। क्योंकि यहां मौन में भक्ति बोलती हैं। और मधुमक्खियों की गूंज में माता भ्रामरी देवी के होने की उपस्थिति दर्ज कराती है।

इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, 10वीं शताब्दी में यहां एक भव्य मंदिर हुआ करता था, जहां गंडई जमींदारी के राजा पूजा करने आया करते थे। कहा जाता है कि राजा अपनी दोधारी तलवार लेकर माता के दरबार जाते थे, और सुरही नदी उनकी तलवार देख उन्हें रास्ता दे देती थी। एक बार राजा पूजा के बाद तलवार वहीं भूल गए, जिसके बाद नदी ने कभी रास्ता नहीं दिया और धीरे-धीरे मंदिर विलुप्त हो गया।

मंदिर परिसर और आस-पास आज भी 10वीं शताब्दी के शिलालेख, खंडित मूर्तियां और शिलाखंड देखे जा सकते हैं, जो यहां की ऐतिहासिक समृद्धि के गवाह हैं। मां भ्रामरी की मुख्य प्रतिमा के अलावा आसपास कई अन्य मूर्तियां मौजूद हैं, जिनका वास्तुशिल्प बताता है कि यह स्थान कभी समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा। यह स्थान आज भी दिखावे से परे है।

यहां कोई शिखर नहीं, कोई चांदी का दरवाजा नहीं, सिर्फ एक वृक्ष, और उसके नीचे जाग्रत देवी विराजमान हैं। इसी सादगी में ही भंवरदाह की खासियत छिपी है।  हर साल नवरात्रि के बाद यहां नवरात्रि मनाई जाती है, और अखंड ज्योत जलाई जाती हैं। यह परंपरा पिछले 17 वर्षों से लगातार चली आ रही है। नौ दिनों तक जलने वाली इन ज्योतों का अंतिम दिन हवन और पूजन के साथ सुरही नदी में विसर्जन होता है।

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