जानिए त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर का क्या है इतिहास?

सावन का महीना पूरी तरह से देवों के देव महादेव को समर्पित होता है और इस दौरान जो भक्त पूरी श्रद्धा भक्ति से भगवान शिव की पूजा के साथ जलभिषेख करता है, तो उन्हें सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। सावन के पावन दिनों में भक्त शिव मंदिर या फिर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए जाते रहते हैं। इस दौरान भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के लिए भक्त दूर-दराज से पहुंचते हैं। ऐसे में अगर आप भी शिव भक्त हैं, तो ये खबर आपके लिए बहुत जरुरी है, क्योंकि आज हम 12 ज्योतिर्लिंगों में से 1 ज्योतिर्लिंग के बारे में आपको जानकारी देने वाले हैं जो काफी रहस्यमयी और दिलचस्त है।
श्री त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर महाराष्ट्र के नासिक से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर ब्रह्मगिरी नामक पर्वत के पास स्थित है, जहाँ से गोदावरी नदी बहती है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर एक धार्मिक केंद्र है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। त्र्यंबकेश्वर शहर ब्रह्मगिरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 3000 फीट है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर का रखरखाव त्र्यंबकेश्वर मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
उन्होंने शिवप्रसाद भक्त निवास का निर्माण किया है जिसमें 24 कमरे बनाए गए हैं। इनमें कॉन्फ्रेंस हॉल, लिफ्ट और गर्म पानी की सुविधा मौजूद है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर का अपना इतिहास है। यह पौराणिक महत्व का मंदिर है। हिंदू मान्यताओं में इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में स्थान प्राप्त है. यहां महादेव की पूजा होती है। महाराष्ट्र के नासिक स्थित इस मंदिर की दुनिया भर में ख्याति है। यहां काले पत्थरों पर नक्काशी अद्भुत है।
हिंदू मान्यताओं में त्र्यंबकेश्वर मंदिर को अत्यंत पवित्र स्थलों में से गिना जाता है। यह भगवान शिव के भक्तों के लिए बड़ा तीर्थस्थल है। यह पौराणिक मंदिर महाराष्ट्र में नासिक एयरपोर्ट से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस गांव का नाम त्र्यंबक है। यहीं पर गोदावरी के रूप में गंगा के धरती पर आने की कहानी भी कही जाती रही है। यहां भगवान को त्रय यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अवतार कहा जाता है।
मुगलों के हमले के बाद इस मंदिर के जीर्णोद्धार का श्रेय पेशवाओं को दिया जाता है। तीसरे पेशवा के तौर पर विख्यात बालाजी यानी श्रीमंत नानासाहेब पेशवा ने इसे सन 1755 से 1786 के बीच बनवाया था। पौराणिक तौर पर यह भी कहा जाता है कि सोने और कीमती रत्नों से बने लिंग के ऊपर मुकुट महाभारत के पांडवों द्वारा स्थापित किया गया था। कहा जाता है सत्रहवी शताब्दी में जब इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा था तब इस कार्य में 16 लाख रुपये खर्च हुए थे। त्र्यंबक को गौतम ऋषि की तपोभूमि के तौर पर भी जाना जाता है।
काले पत्थरों पर नक्काशी और अपनी भव्यता के लिए त्र्यंबकेश्वर मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है. पूरा मंदिर काले पत्थरों से बना हुआ है। चौकोर मंडप और बड़े दरबाजे मंदिर की शान प्रतीत होते हैं। मंदिर के अंदर स्वर्ण कलश है और शिवलिंग के पास हीरों और अन्य कीमती रत्नों से जड़े मुकुट रखे हैं। ये सभी पौराणिक महत्व के हैं। मुगलकाल के शासकों ने भारत के अंदर कई शहरों में हिंदू देवी -देवताओं के तीर्थस्थलों को ध्वस्त करवा दिया था, उनमें एक नासिक का त्र्यंबकेश्वर मंदिर भी था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब में इसका जिक्र किया है।
उन्होंने लिखा है सन् 1690 में मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने नासिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर शिवलिंग को तोड़ दिया था। मंदिर को भी काफी क्षति पहुंचाई थी और इसके ऊपर मस्जिद का गुंबद बना दिया था। यहां तक कि औरंगजेब ने नासिक का नया नाम भी बदल दिया था। लेकिन सन 1751 में मराठों का फिर से नासिक पर आधिपत्य हो गया, तब इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।
कहा जाता है कि संत ज्ञानेश्वर ने 24 साल की उम्र में यहीं समाधी ली थी। श्री निवृत्तिनाथ संत श्री ज्ञानेश्वर के बड़े भाई थे। नौ नाथ गुरुओं में से एक श्री गहिनीनाथ ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया था। श्री संत ज्ञानेश्वर ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया था। इसलिए उन्हें वारकरी संप्रदाय का संस्थापक भी माना जाता है। उनके सुझाव पर संत ज्ञानेश्वर ने भगवद् गीता पर प्राकृत भाषा में एक टीका लिखी थी जिसे “ज्ञानेश्वरी” के नाम से जाना जाता है ताकि इसे आम लोग समझ सकें। उन्होंने 24 वर्ष की आयु में त्र्यंबकेश्वर में संजीवन समाधि ली थी। संत निवृत्तिनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित यात्रा के अवसर पर लाखों वारकरी साम्प्रदाय के लोग त्र्यंबकेश्वर में एकत्रित होते हैं।
शिवपुराण के अनुसार गौतम ऋषि और गोदावरी नदी की प्रार्थना पर भगवान शिव ने यहां निवास किया और त्र्यंबकेश्वर नाम से प्रसिद्द हुए। इस ज्योतिर्लिंग की ख़ास बात ये है कि इसमें ब्रम्हा, विष्णु और महेश तीनों का समावेश है। मंदिर ब्रम्हगिरी की तलहटी पर स्थित हैं, जहां से गोदावरी नदी निकलती है। मंदिर परिसर में पवित्र तालाब स्थित है, जिसे कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहीं से गोदावरी नदी ब्रम्हगिरी पहाड़ियों पर लुप्त होने के बाद फिर से मिलती है।
मंदिर काले पत्थरों से बना है और इसकी वास्तुकला सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के शिवलिंग में तीन मुख हैं, जिन्हें भगवान ब्रह्मा, विष्णु, और रूद्र का रूप माना जाता है। शिवलिंग के चारों ओर एक रत्न जड़ित मुकुट भी है, जिसे त्रिदेव के मुखोटे के तौर पर देखा जाता है। त्र्यंबक को गौतम ऋषि की तपोभूमि के तौर पर भी जाना जाता है। सावन के महीने में इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उमड़ते हैं।
इस मंदिर में भक्तों को गर्भ गृह के अंदर प्रवेश नहीं दिया जाता। हालांकि भक्त ज्योतिर्लिंग के दर्शन 5 मीटर की दूरी से कर सकते हैं। जिस तरह उत्तर भारत में पापनाशिनी गंगा का महत्व है, वही दक्षिण में गोदावरी का है। जिस तरह गंगा अवतरण का श्रेय महातपस्वी भागीरथ जी को है, वैसे ही गोदावरी का प्रवाह ऋषिश्रेष्ठ गौतम जी की महान तपस्या का फल है, जो उन्हें भगवान आशुतोष से प्राप्त हुआ था।
बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर यहां बड़ा कुंभ मेला लगता है और श्रद्धालुजन गौतमी गंगा में स्नान कर तथा भगवान श्री त्र्यंबकेश्वर का दर्शन कर अपने को कृतकृत्य मानते हैं। शिवपुराण में वर्णन हैं कि गौतम ऋषि तथा गोदावरी और सभी देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने इस स्थान पर निवास करने निश्चय किया और त्र्यंबकेश्वर नाम से विख्यात हुए।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के चारों ओर एक रत्न जड़ित मुकुट रखा गया है, जिसे त्रिदेव के मुखोटे के रुप में माना गया है। इस मुकुट में हीरा, पन्ना और कई बेशकीमती रत्न लगे हुए हैं। त्र्यंबकेश्वर मंदिर में इसे सिर्फ सोमवार के दिन शाम 4 से 5 बजे तक दर्शनार्थियों को दिखाया जाता है। गोदावरी नदी के किनारे बने त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से किया गया है। इस मंदिर की वास्तुकला बहुत ही अद्भुत और अनोखी है।
भव्य त्र्यंबकेश्वर मंदिर इमारत सिंधु आर्यशैली का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर के भीतर एक गर्भगृह है, जिसमें प्रवेश करने के पश्चात् शिवलिंग आंख के समान दिखाई देता हैं, जिसमें जल भरा रहता हैं। यदि ध्यान से देखा जाए तो इसके भीतर एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन तीनो लिंगो को त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार माना जाता है। इस मंदिर में कालसर्प दोष की शांति वैदिक पंडितों के द्वारा करवाई जाती हैं।
शास्त्रों में लिखी कहानी के अनुसार एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मण की पत्नियां किसी बात पर गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन सभी पत्नियों ने अपने पतियों को गौतम ऋषि का अपमान करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके लिए भगवान गणेश की आराधना की उनकी आराधना से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनसे वर मांगने को कहा। उन ब्राह्मणों ने कहा प्रभु किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दीजिए। गणेश जी को विवश होकर उनकी बात माननी पड़ी। तब गणेश जी ने एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर फसल खाने लगे। देववश गौतम वहां पहुंचे और तिनकों की मुठ्ठी से उसे हटाने लगे, तृणों के स्पर्श से गौ पृथ्वी पर गिर पड़ी और ऋषि के सामने ही मर गई।
उस समय छिपे हुए सारे ब्राह्मण एकत्रित होकर गौ हत्यारे कह कर ऋषि गौतम का अपमान करने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति को देखकर गौतम ऋषि उन ब्राह्मणों से प्रायश्चित पूछा। तब उन्होंने कहा गौतम तुम अपने पाप को सर्वत्र बताते हुए तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा करो, फिर लौटकर यहां एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद इस ब्रह्मगिरि पर सौ बार घूमों, तभी तुम्हारी शुद्धि होगी। यदि यह न कर पाओ तो यहां गंगा जी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंग से भगवान शिवजी की आराधना करो। इसके बाद फिर से गंगा जी में स्नान करके पुनः सौ घड़ों से पार्थिव शिवलिंग को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।
गौतम ऋषि ने इस प्रकार कठोर प्रायश्चित किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे वर मांगने को कहा। महर्षि गौतम ने कहा भगवान आप मुझे गौ हत्या के पाप से मुक्त कर दीजिए। भगवान शिव ने कहा गौतम तुम सर्वदा निष्पाप हो। गौ हत्या का अपराध तुम पर छल पूर्वक लगाया गया था। ऐसा करने के लिए तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दंड देना चाहता हूं। इस पर महर्षि गौतम ने कहा उन्हीं के उस कार्य से मुझे आपके दुर्लभ दर्शन प्राप्त हुए हैं। अब उन्हें मेरा परम समझ कर उन पर आप क्रोध ना करें। बहुत सारे ऋषि मुनियों और देवगणों एवं गंगा ने वहां उपस्थित होकर ऋषि गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान शिव से सदा वहीं पर निवास करने की प्रार्थना की। देवों के प्रार्थना करने पर भगवान भोलेनाथ वहीं गौतमी-तट पर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।


