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जानिए मैहर मंदिर के अनसुलझे रहस्य, बंद कपाट के अंदर आखिर कौन करता है पूजा?

मध्यप्रदेश

भारत देश में ऐसे कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं, जहां के अनोखे रहस्य और चमत्कारों से दुनियाभर के लोग आज भी अनजान है। इसी रहस्य और चमत्कार के कारण ही श्रद्धालुओं में देवी-देवताओं के प्रति आस्था लगातार बढ़ रही है। वही अगर हम माता के 51 शक्तिपीठों के बारे में बात करें, तो यहां भी देवी की ऐसी मंदिरें स्थित है, जिसका रहस्य लोगों को हैरान कर देती है। ऐसा रहस्य जिसे आज तक किसी ने नहीं सुलझा पाया है।
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मैहर मंदिर मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर तहसील में त्रिकूट पर्वत पर 600 फीट ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्त को 1001 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मैहर का अर्थ मां का हार से लिया जाता है। यह मंदिर एक शक्तिपीठ है। मान्यता है कि जब शिव के हाथ में पड़े सती के शव को भगवान विष्णु ने सुदर्शन से काटा तो उसके हिस्से और आभूषण अलग-अलग जगहों पर गिरे, जो बाद में शक्तिपीठ बने। मैहर में माता का हार गिरने से इस जगह को मैहर कहा जाता है।
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मैहर में शारदा माता का मंदिर है। इस मंदिर पर देश भर के हिंदू समुदाय के लोगों में आस्था है। इस मंदिर के रहस्य लोगों की जुबान पर हैं। मान्यता है कि मंदिर खुलने से पहले ही कोई यहां पूजा कर जाता है। इस मंदिर के बारे में कई रहस्यमयी बातें कही जाती है। कहा जाता है कि मंदिर का कपाट बंद होने के बाद भी अंदर से पूजा करने की आवाजें आती हैं और जब सुबह कपाट खोला जाता है, तो वहां हो चूका होता है। ऐसे में ये दुनियाभर के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ है।

ऐसा कहा जाता है कि आल्हा और उदल नाम के 2 भाई शारदा माता के परम भक्त थे। आल्हा और ऊदल बुंदेलखंड के वीर योद्धा थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ भीषण युद्ध लड़ा था और गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया था। युद्ध के बाद आल्हा, उदल ने 12 वर्षों तक माता शारदा की तपस्या की और दोनों भाइयों ने ही इस मंदिर की खोज की। वे यहां की माता को माई कहकर पुकारते थे। इसलिए यहां की माता को शारदा माई कहा जाने लगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार आदिशंकराचार्य ने यहां सर्वप्रथम पूजा की थी और जिसके बाद यहां मूर्ति की स्थापना की गई।

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शाम की आरती के बाद जब कपाट बंद कर दिए जाते हैं, तब भी अंदर से घंटी और पूजा की आवाजें आती हैं। मान्यता है कि वीर योद्धा आल्हा आज भी माता की पूजा करने आते हैं। मंदिर के महंतों का कहना है कि सुबह जब कपाट खोले जाते हैं तो माता का श्रृंगार और पूजा पहले से की हुई मिलती है। लोगों का मानना है कि यह पूजा आल्हा करते हैं। अक्सर सुबह की आरती भी वे ही करते हैं।

मंदिर के एक पुजारी का कहना है कि मंदिर में मां का पहला श्रृंगार आल्हा करते हैं। जब ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर के द्वार खोले जाते हैं तो यहां पूजा हुई मिलती है। उनका कहना है इस रहस्य का पता लगाने वैज्ञानिकों की टीम भी पहुंची थी, लेकिन वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। दरअसल, बुंदेलखंड के महोबा में एक परमार रियासत थी, आल्हा और ऊदल नाम के दो भाई इनके सामंत थे।

ये दोनों वीर और प्रतापी योद्धा थे। कालिंजर के परमार राजा के राज्य में एक जगनिक नाम के कवि थे, जिन्होंने आल्हा खंड नाम का काव्य लिखा था। इसमें दोनों भाइयों की वीरता की 52 कहानियां लिखी गईं हैं। इसके अनुसार इन्होंने आखिरी लड़ाई पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ लड़ी थी। कहा जाता है कि इस लड़ाई में पृथ्वीराज हार गए थे, लेकिन गुरु गोरखनाथ के आदेश पर इन्होंने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया। इसके बाद इन्हें वैराग्य हो गया और इन्होंने संन्यास ले लिया।
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चैत्र नवरात्रि के दौरान मैहर मंदिर में विशाल मेला लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस दौरान 9 दिनों तक मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए प्रशासन ने गर्भगृह में वीआईपी दर्शन पर प्रतिबंध लगाया है। लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र यह मंदिर आज भी रहस्यमय और चमत्कारी घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है।

इस बार मैहर मंदिर में नवरात्रि मेले के दौरान सुरक्षा के लिए 500 से अधिक पुलिसकर्मी, ड्रोन, सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है। मेले को 6 जोनों में विभाजित किया गया है, जहां विश्रामगृह, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल और पार्किंग की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। जिससे भक्त बिना किसी परेशानी के माता का दर्शन कर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकें। वही इस मंदिर का रहस्य और यहां होने वाला चमत्कार अभी भी लोगों के सोच से परे है।

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