13 करोड़ की पार्किंग में तीन साल में सिर्फ ढांचा

बिलासपुर में मल्टीलेवल पार्किंग बनी शोपीस, सड़कें अब भी वाहनों से भरी
बिलासपुर में करोड़ों रुपये की लागत से बनाई जा रही मल्टीलेवल और शटल टाइप पार्किंग सुविधाएं आज सवालों के घेरे में हैं। स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत विकसित की जा रही ये पार्किंग व्यवस्था न तो जनता की सुविधा बन पाई है, और न ही प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर रही है।
कलेक्टोरेट परिसर की 16.80 करोड़ की पार्किंग – खाली ही रहती है
कलेक्टोरेट परिसर में 16.80 करोड़ रुपये की लागत से बनी मल्टीलेवल पार्किंग का उपयोग नाम मात्र का हो रहा है।
निर्माण के दौरान 245 कर्मचारियों ने पार्किंग के लिए सहमति दी थी और 22 ने मासिक पास भी बनवाया, लेकिन अब भी अधिकांश सरकारी वाहन सड़कों पर ही खड़े होते हैं। कई बार प्रशासन द्वारा मौखिक और लिखित अनुरोधों के बावजूद भी कर्मचारी इसका उपयोग नहीं कर रहे हैं।
कोतवाली परिसर की 28.74 करोड़ की पार्किंग – दुकानों से आय, पार्किंग में सन्नाटा
कोतवाली परिसर में बन रही 28.74 करोड़ की मल्टीलेवल पार्किंग की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है।
हालांकि दुकानों की बिक्री से 15.16 करोड़ रुपये की आय हो चुकी है, लेकिन पार्किंग सुविधा का उपयोग नहीं हो रहा। पार्किंग एरिया में केवल गिनती के वाहन ही खड़े दिखाई देते हैं, जिससे इसका मूल उद्देश्य ही फेल होता नजर आ रहा है।
मुख्य अभियंता नगर निगम बिलासपुर, राजकुमार मिश्रा ने भी माना कि पार्किंग का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है।
पुराना बस स्टैंड: 12.60 करोड़ की शटल टाइप पार्किंग – तीन साल में सिर्फ ढांचा
पुराने बस स्टैंड में 12.60 करोड़ की लागत से बन रही ऑटोमैटिक शटल टाइप पार्किंग का हाल और भी खराब है।
इस प्रोजेक्ट को कोलकाता की सिम पार्क कंपनी को एक साल में पूरा करना था, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी केवल स्ट्रक्चर खड़ा हुआ है। स्मार्ट सिटी द्वारा कंपनी पर 60 लाख रुपये की पेनाल्टी लगाई गई है, लेकिन काम की गति अब भी धीमी है।
मुख्य अभियंता राजकुमार मिश्रा ने इसे गंभीर लापरवाही माना है।





