लिंगियाडीह में उजड़ते घर: 37 दिन से धरने पर बैठे सैकड़ों परिवार, गार्डन योजना पर सवाल

बिलासपुर। लिंगियाडीह में पिछले 37 दिनों से खुले आसमान के नीचे बैठे सैकड़ों परिवार अपनी छत बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। जहां कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी, आज वहीं बेचैनी और चिंता का माहौल है। स्थिति यह है कि लोग हर सुबह इसी डर के साथ जागते हैं कि कहीं आज उनका घर बुलडोजर की चपेट में न आ जाए।

गार्डन और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना के चलते यहां के गरीब परिवारों को उजाड़ा जा रहा है। ये वही घर हैं जिन्हें मजदूरों, महिलाओं और बुजुर्गों ने पाई-पाई जोड़कर खड़ा किया था। लेकिन अब बुलडोजर की आहट इनके भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है। बच्चों की पढ़ाई रुक गई है, महिलाएं रातभर जागकर रोती हैं और बुजुर्ग इस डर में जी रहे हैं कि कहीं आखिरी उम्र में उनका सहारा न छिन जाए।

स्थानीय लोगों का दावा है कि नगर निगम ने उनसे 10 रुपये प्रति वर्गफुट की दर से रकम ली थी, सर्वे में 505 परिवारों के नाम भी दर्ज किए गए, लेकिन पट्टा आज तक नहीं मिला। इसी बीच मार्च 2025 में 150 से ज्यादा मकान और दुकानें तोड़े जाने के बाद लोगों का डर और बढ़ गया। उन दीवारों पर कभी बच्चों की ऊंचाई के निशान थे, आज वहां मलबा और यादों का बोझ बचा है।

धरने में पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने परिवारों से मुलाकात की और राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि गरीबों के घर गिराकर गार्डन बनाना इंसानियत के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि 40-50 साल से बसे परिवारों को उजाड़ना गलत है और पहले दिए गए पट्टों को बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। लिंगियाडीह की महिलाएं आज पूछ रही हैं “क्या गरीब होना गुनाह है?”

बच्चों की एक ही चिंता “पापा, हमारा घर टूट जाएगा क्या?”

और बुजुर्गों की विनती“मरने से पहले एक छत तो रहने दो।”

37 दिन से चल रहा शांतिपूर्ण महाधरना अब सरकार के फैसले का इंतज़ार कर रहा है। लोगों को उम्मीद है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और उनका घर, उनकी पहचान और उनका जीवन बच जाएगा।

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