25 साल पुराने फर्जी वेतन घोटाले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी आरोपी बरी

बिलासपुर। जगदलपुर के ढाई दशक पुराने बहुचर्चित फर्जी वेतन आहरण और भ्रष्टाचार मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा और केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

1979-85 के बीच फर्जी वेतन आहरण का आरोप

मामला जगदलपुर के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है, जहां वर्ष 1979 से 1985 के बीच करीब 42 हजार रुपये के फर्जी वेतन बिल बनाकर सरकारी राशि निकालने का आरोप लगाया गया था। तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरके सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर सफाई कर्मचारियों के नाम पर फर्जी वेतन बिल तैयार करने और जालसाजी का आरोप था।

ट्रायल कोर्ट ने दी थी 2-2 साल की सजा

जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को आरोपियों को दोषी मानते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2-2 साल की सजा और जुर्माना लगाया था।

साक्ष्य नहीं मिले, गवाहों के बयान से मामला कमजोर

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि गवाहों के बयान स्पष्ट नहीं थे और जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकाले जाने का आरोप था, उन्होंने भी फर्जीवाड़े की पुष्टि नहीं की। कई गवाहों ने कहा कि उन्हें काम के दौरान वेतन मिला और उन्होंने हस्ताक्षर कर भुगतान लिया।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ जालसाजी या धोखाधड़ी के ठोस प्रमाण पेश नहीं किए गए। हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान फर्जी होने का कोई विशेषज्ञ प्रमाण नहीं मिला और कई दस्तावेज केवल कार्बन कॉपी थे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।

साथ ही हाईकोर्ट ने जमानत पर चल रहे आरोपियों के जमानती बांड 6 महीने तक प्रभावी रखने के निर्देश भी दिए हैं।

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