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युक्तियुक्तकरण पर बढ़ा विवाद: शिक्षक संघ-शिक्षा विभाग आमने-सामने; गुरूजी बोले जनवरी 2025 में 43243 शिक्षकों के पद रिक्त, फिर शिक्षक अतिशेष कैसे

3 हजार शिक्षक भर्ती किए गए, फिर क्यों है शाला शिक्षक विहीन

रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग द्वारा लागू की जा रही युक्तियुक्तकरण नीति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जहां शिक्षा विभाग इसे संतुलित और गुणवत्तापूर्ण मान रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन ने इसे शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम बताया है। संघ का कहना है कि इससे शासकीय स्कूलों की स्थिति और बदतर होगी।

टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय शर्मा ने बताया कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया के तहत प्राथमिक स्कूलों में 1+2 के स्थान पर 1+1 और मिडिल स्कूलों में 1+4 के बजाय 1+3 शिक्षक रखने का निर्णय लिया गया है। इससे प्रदेशभर में 30700 प्राथमिक और 13149 मिडिल स्कूलों से कुल 43849 पद समाप्त कर दिए गए हैं।

अतिशेष शिक्षकों की जिम्मेदारी किसकी?

संघ ने सवाल उठाया कि शिक्षकों की अतिशेषता के लिए कौन जिम्मेदार है। विभाग जब मनमाने ढंग से स्थानांतरण और पदोन्नति करता है तो अतिशेष की स्थिति बनती है। इसके बाद उन्हीं शिक्षकों को गैरजरूरी घोषित कर दिया जाता है। संघ का कहना है कि प्रायमरी स्कूलों में 1 से 5वीं तक पढ़ाने के लिए कम से कम 5 शिक्षकों की जरूरत होती है। 18 पीरियड की पढ़ाई केवल दो शिक्षकों से कराना असंभव है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी।

कामर्स विषय में व्याख्याता की कमी

कक्षा 11वीं-12वीं में कामर्स विषय के लिए केवल एक व्याख्याता नियुक्त करने पर भी संघ ने आपत्ति जताई। 6 पीरियड वाले विषय को एक शिक्षक द्वारा पढ़ाया जाना व्यावहारिक नहीं है। संघ ने जानकारी दी कि 31 जनवरी 2025 तक सहायक शिक्षक के 33178, शिक्षक के 5442 और व्याख्याता के 4623 पद रिक्त हैं। इसके बावजूद सरकार योग्य बेरोजगार डीएड, बीएड, टेट धारकों की नियुक्ति नहीं कर रही, जो चिंता का विषय है।

एकल शिक्षकीय और शिक्षकविहीन स्कूलों की संख्या चिंताजनक

टीचर्स एसोसिएशन ने बताया कि राज्य में 212 प्राथमिक स्कूल शिक्षकविहीन और 6872 एकल शिक्षकीय हैं। 48 मिडिल स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और 255 मिडिल स्कूल एकल शिक्षकीय हैं। बावजूद इसके विभाग इन स्कूलों को प्राथमिकता नहीं दे रहा। संघ का कहना है कि बच्चों के स्कूल छोड़ने का कारण युक्तियुक्तकरण नहीं, बल्कि अभिभावकों का स्थान परिवर्तन, शिक्षा के प्रति लापरवाही और कौशल शिक्षा की कमी है। शिक्षकों का कहना है कि अगर यह निर्णय नहीं बदला गया तो शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा और सरकारी स्कूलों में पढ़ाई संकट में पड़ जाएगी।

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