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छत्तीसगढ़ के कोल ब्लॉक से राजस्थान को मिलेगी ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख टन कोयले की कमी होगी दूर

राजस्थान में बढ़ती बिजली मांग और कोयले की कमी के बीच राज्य को बड़ी राहत मिली है। छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र स्थित केंते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल ब्लॉक के लिए वन भूमि उपयोग की सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद राजस्थान के प्रमुख ताप विद्युत संयंत्रों को लंबे समय तक कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित होने की उम्मीद बढ़ गई है। इस परियोजना से राज्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

बिजली उत्पादन को मिलेगा बड़ा सहारा

केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से निकलने वाला कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांटों में उपयोग किया जाएगा। वर्तमान में इन बिजलीघरों को हर साल लगभग 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होती है, जबकि उपलब्ध स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही थी।

नई खदान से करीब 90 लाख टन कोयले की वार्षिक कमी दूर होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मात्रा जयपुर शहर की लगभग डेढ़ वर्ष की औसत बिजली आवश्यकता के बराबर मानी जा सकती है। इससे बिजली उत्पादन में स्थिरता आएगी और महंगे कोयले की खरीद पर निर्भरता कम होगी।

खनन के लिए बड़े वन क्षेत्र का होगा उपयोग

परियोजना के तहत लगभग 1743 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग खनन कार्यों के लिए किया जाएगा। यह क्षेत्र हसदेव-अरण्य के घने जंगलों में स्थित है, जो जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस क्षेत्र में हाथी, तेंदुआ, भालू, चीतल, लकड़बग्घा, सियार और पैंगोलिन जैसी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। परियोजना के कारण हजारों पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका है। इसी वजह से वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंधन योजनाएं लागू करने की शर्त रखी गई है।

कई शर्तों के साथ मिली प्रारंभिक मंजूरी

परियोजना को फिलहाल स्टेज-1 सैद्धांतिक वन मंजूरी प्राप्त हुई है। खनन कार्य दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में करीब 1002 हेक्टेयर क्षेत्र में अधिकतम 15 वर्षों तक खनन होगा। इसके बाद पर्यावरणीय मानकों और जैव विविधता संरक्षण की समीक्षा के आधार पर दूसरे चरण की अनुमति दी जाएगी।

परियोजना संचालित करने वाली कंपनी को प्रतिपूरक वनीकरण, वन भूमि के बदले नए जंगल विकसित करने, वन्यजीव संरक्षण योजना और मिट्टी एवं जल संरक्षण से जुड़े कार्यों पर भी करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। इसके अलावा खदान से निकाले गए कोयले को राजस्थान तक पहुंचाने के लिए रेलवे कनेक्टिविटी, परिवहन और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास भी करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना राजस्थान की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय प्रभावों और वन संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों पर भी लगातार निगरानी रखना जरूरी होगा।

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