छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: मां का प्यार सर्वोपरि, सिर्फ पैसे से नहीं तय होती बच्चे की कस्टडी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर एक अहम और संवेदनशील फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि बच्चे को उसकी सगी मां से जैसा प्यार, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा मिलता है, उसकी कोई गारंटी नहीं है कि वही चीज उसे सौतेली मां से भी मिले।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बेहतर आर्थिक स्थिति होने के आधार पर पिता बच्चे की कस्टडी का हकदार नहीं बन जाता। बच्चे का भला सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक विकास से तय होता है।

यह मामला बेमेतरा जिले के कोड़वा निवासी लक्ष्मीकांत से जुड़ा है। लक्ष्मीकांत की शादी वर्ष 2013 में हुई थी और उसके दो बेटे हैं। पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा। लक्ष्मीकांत ने अपने 7 साल के बड़े बेटे की कस्टडी की मांग फैमिली कोर्ट में की थी, लेकिन फैमिली कोर्ट ने मां के पक्ष में फैसला देते हुए पिता की याचिका खारिज कर दी थी।

इसके बाद पिता ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने बताया कि उसका पति बिना तलाक लिए दूसरी महिला के साथ रह रहा है। वहीं, क्रॉस एग्जामिनेशन में पिता ने भी स्वीकार किया कि उसका दूसरी महिला से प्रेम संबंध है और उसने मंदिर में उससे शादी की है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे का भविष्य सबसे अहम है। ऐसी स्थिति में, जहां पिता दूसरी महिला के साथ रह रहा हो, बच्चे की कस्टडी देना उसके हित में नहीं माना जा सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पिता की अपील खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि कस्टडी के मामलों में माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का हित सर्वोपरि होता है।

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