3000 साल पुराने इस मंदिर में विज्ञान के सारे सिद्धांत फेल?

भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाती है। यहां की प्राचीन संस्कृति की सबसे बड़ी गवाही यहां के मंदिर देते हैं, जो अपनी संरचनाओं के लिए दुनियाभर में आज भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन मंदिरों की बनावट देखकर हर कोई अचरज में पड़ जाता है। ऐसा ही एक मंदिर निरपुथुर मंदिर है। हजारों साल पुराने इस मंदिर में रहस्यों का भंडार छुपा हुआ है, जिसे आज तक कोई नहीं सुलझा पाया। आज हम बात करेंगे इसी निरपुथुर मंदिर की। कि आखिरकार क्यों इस मंदिर को रहस्यों से भरा और चमत्कारी मंदिर माना जाता है।
केरल को यूं ही “भगवान का अपना देश” नहीं कहा जाता, हरी-भरी वादियों से इस भूमि में बसे है पुथूर गांव जहां स्थित है रहस्यमयी नीरपुथूर महादेव मंदिर। माना जाता है कि यह अद्भुत मंदिर लगभग 3000 साल पुराना है और अपनी अनोखी आभा से यहां आने वाले हर इंसान को मोहित कर देता है। यह पुराना मंदिर अपने अद्भुत शिवलिंग के लिए मशहूर है जो इसे खास बनाता है। सालभर पानी से घिरी यह पवित्र जगह श्रद्धालुओं को आस्था और मन की शांति का अनुभव कराती है।
केरल के मलप्पुरम जिले में 3 हजार साल पुराना एक भगवान शिव का मंदिर है, जो अपनी अनोखी गोलाकार संरचना और 3000 साल से भी अधिक पुराने होने के अनुमान के लिए जाना जाता है। केरल के मलप्पुरम जिले के पुथूर गांव में स्थित है। मंदिर की गोलाकार संरचना इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, मंदिर 3000 साल से भी अधिक पुराना हो सकता है।
मंदिर में एक अद्भुत शिवलिंग है, जो साल भर पानी से घिरा रहता है। यह मंदिर श्रद्धालुओं को आस्था और शांति का अनुभव कराता है। ये मंदिर रहस्यों से भरपूर है, जहां विज्ञान के सारे सिद्धांत फेल हो जाते हैं। यह मंदिर और इसका गर्भगृह आज भी शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के लिए एक अबूझ पहेली बना हुआ है। इस मंदिर का सबसे रहस्यमयी पहलू इसमें मौजूद शिव लिंग हैं।
इस शिवलिंग को लेकर मान्यता है कि यह किसी इंसान के प्रयास से नहीं, बल्कि स्वयं प्रकट हुआ है। विज्ञान जहां किसी चीज की उत्पत्ति और रूप को विश्लेषणात्मक नजर से देखता है, वही इस शिवलिंग की मौजूदगी वैज्ञानिकों को स्तब्ध लकर देती है। मंदिर में स्थित जल का श्रोत भी एक रहस्य ही है। यहां शिवलिंग के चरों तरफ सालों भर जल भरा होता है, चाहे सूखा हो या बारिश का मौसम।
इस मंदिर में पानी की हमेशा मौजूदगी ने भू-वैज्ञानिकों को भी सोच में दाल दिया है। यह पानी कहां से आता है।, इसका कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। इस जल को चमत्कारी भी कहा जाता है, क्योंकि श्रद्धालुओ का मानना है कि इसमें रोग निवारण की शक्ति है। माना जाता है, कि इसमें कुछ खनिज तत्व हो सकते हैं, जो स्वास्थ्य को लाभ पहुंचते हों, लेकिन जिस स्तर पर इसे औषधि जल कहा जाता है, वह विज्ञान की सीमाओं से परे प्रतीत होता है।
आउटलुक ट्रैवलर के हिसाब से इस मंदिर की सबसे अद्भुत खासियत है यहां विराजमान स्वयंभू शिव। संस्कृत में “स्वयंभू” का मतलब है “स्वयं प्रकट हुआ” मतलब यह शिवलिंग किसी इंसान ने स्थापित नहीं किया बल्कि खुद धरती से प्रकट हुआ है। यही वजह है कि यह मंदिर भक्तों के लिए ज्यादा आस्था और रहस्य की जगह बनी हुई है। इस मंदिर का दिव्य वातावरण श्रद्धालुओं को गहरी आध्यात्मिक एहसास कराता है जहां वे न केवल अपनी आस्था से जुड़ते हैं बल्कि अपनी संस्कृति का भी अनुभव करते हैं। मलबार देवस्वम बोर्ड द्वारा संचालित यह मंदिर सभी भक्तों को भक्ति की एक पवित्र यात्रा पर आमंत्रित करता है।
इस पवित्र मंदिर तक पहुंचना बेहद आसान है। यदि आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं तो सबसे पास कालीकट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से 60 किमी दूर सबसे सही रहेगा। अगर आप रेल यात्रा पसंद करते हैं तो तीरूर रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 60.7 किमी की दूरी पर स्थित है। दुसरी तरफ सड़क से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पेरिन्थलमन्ना KSRTC बस डिपो मात्र 25.9 किमी दूर है। यह यात्रा आपको न सिर्फ आध्यात्मिक शांति देगी बल्कि केरल की खूबसूरत वादियों और इसकी संस्कृति से भी रूबरू कराएगी।




