अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर दिन में 16 बार होता है सूर्योदय और सूर्यास्त, 2030 तक होगा रिटायर

दिल्ली। इसरो के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर पहुंच चुके हैं, जहां वे 14 दिनों तक वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे। आइएसएस पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली अब तक की सबसे बड़ी मानव निर्मित संरचना है, जिसे अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर विकसित किया है। यह स्टेशन वैज्ञानिक अनुसंधान, अंतरिक्ष खोज और वैश्विक सहयोग का प्रमुख केंद्र है।

ISS पृथ्वी से लगभग 370-460 किमी की ऊंचाई पर स्थित है और 28,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से परिक्रमा करता है, जिससे यह हर दिन पृथ्वी की 16 बार परिक्रमा करता है। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष यात्री दिन में 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुभव करते हैं।

इसका आकार एक फुटबॉल मैदान जितना है और इसमें छह शयन कक्ष, दो बाथरूम, एक जिम और 360 डिग्री दृश्य देने वाली ‘कपोल’ खिड़की है। ISS को 16 दबावयुक्त मॉड्यूलों से बनाया गया है, जिनमें से पहला 1998 में अंतरिक्ष में भेजा गया था। शुरुआत में इसमें सिर्फ तीन मॉड्यूल थे, लेकिन आज यह एक पूर्ण अंतरिक्ष प्रयोगशाला बन चुका है, जहां 21 देशों के 260 से अधिक अंतरिक्ष यात्री काम कर चुके हैं। नासा और इसके सहयोगी देश 2030 तक ISS को संचालित करने की योजना बना रहे हैं। इसके बाद इसे एक नियंत्रित प्रक्रिया के तहत प्रशांत महासागर के एक सुनसान हिस्से में गिरा दिया जाएगा, ताकि इसे सुरक्षित रूप से रिटायर किया जा सके।

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