बिलासपुर रजिस्ट्री कार्यालय में हंगामा: सरकार के सुशासन पर उठे सवाल

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ सरकार के ‘सुशासन तिहार’ की पोल बिलासपुर के रजिस्ट्री कार्यालय में खुलती दिख रही है, जहाँ जनता को जमीन की खरीदी-बिक्री में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन प्लॉट्स का नामांतरण (म्यूटेशन) पहले से ही अटका हुआ है, उन्हीं खसरों पर दूसरे प्लॉट्स की रजिस्ट्री भी रुक गई है। यह सब NGDRS (नेशनल जेनेरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम) पोर्टल की तकनीकी गड़बड़ी के कारण हो रहा है, जिससे जमीन मालिकों और खरीदारों दोनों को संकट का सामना करना पड़ रहा है।

NGDRS की गड़बड़ी बनी मुसीबत की जड़

बिलासपुर में जमीन की खरीदी-बिक्री से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा सामने आया है। दरअसल, जिन जमीनों की पहले बिक्री हो चुकी है, उनका नामांतरण अभी तक लंबित है। इसी वजह से उसी खसरे में बची हुई दूसरी जमीनों की रजिस्ट्री भी रुक गई है। NGDRS पोर्टल पर तकनीकी रूप से यह दिखाया जा रहा है कि संबंधित खसरे में बिक्री योग्य रकबा (क्षेत्रफल) शेष नहीं है, जबकि हकीकत में उस खसरे के बड़े हिस्से में से केवल एक छोटा टुकड़ा ही पहले बेचा गया था। इस तकनीकी खामी से जमीन मालिक और खरीदार, दोनों ही हताश हैं।

बिलासपुर के कई इलाकों में बड़े भूखंडों की प्लाटिंग कर छोटे-छोटे प्लॉट बेचे जा रहे हैं। लेकिन NGDRS में नामांतरण की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इसने नई रजिस्ट्रियों पर ब्रेक लगा दिया है। अगर किसी बड़े खसरे के एक हिस्से की बिक्री हुई है और उसका नामांतरण लंबित है, तो NGDRS पोर्टल उसी खसरे के बचे हुए अन्य हिस्सों की रजिस्ट्री नहीं होने दे रहा। पोर्टल पर स्पष्ट रूप से लिखा आता है— “प्रविष्ट खसरा नामांतरण हेतु लंबित है और विक्रय के लिए रकबा शेष नहीं है।” इस स्थिति में न तो आगे की रजिस्ट्री हो पा रही है और न ही जमीन का वास्तविक उपलब्ध रकबा दिख रहा है, जिससे करोड़ों के सौदे अटक गए हैं।

अधिकारी कैमरे पर बोलने से कतराए, जनता जाए तो कहाँ जाए?

जब इस गंभीर समस्या को लेकर मीडिया ने बिलासपुर के रजिस्ट्री कार्यालय में तैनात रजिस्ट्रार आर.के. स्वर्णकार से जवाब मांगा, तो उन्होंने कैमरे के सामने बयान देने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें भी अभी तक इस तकनीकी बाधा का कोई स्पष्ट समाधान नहीं पता। ऐसे में सवाल उठता है कि जब डिजिटल व्यवस्था में भी समाधान नहीं है और जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने से कतरा रहे हैं, तो आम जनता किसके पास जाए? जमीन मालिकों के करोड़ों के सौदे अधर में लटके हैं, लेकिन सिस्टम में सुधार की कोई उम्मीद फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है।

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