छत्तीसगढ़ का अनोखा मंदिर जहां कुत्तों की पूजा होती है..

भारत में जहां देवी-देवताओं के अनगिनत मंदिर हैं, वहीं छत्तीसगढ़ राज्य में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां कुत्तों की पूजा की जाती है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 97 किलोमीटर दूर बालोद जिले के खपरी गांव में स्थित है। इस मंदिर का नाम कुकुरदेव मंदिर है और इसका इतिहास और मान्यता बहुत दिलचस्प है।
कुकुरदेव मंदिर का रहस्य और इतिहास
कुकुरदेव मंदिर में कुत्ते की एक प्रतिमा स्थापित की गई है, साथ ही वहां एक शिवलिंग भी है। इस मंदिर की अजीबोगरीब मान्यता और मंदिर के निर्माण की कहानी बहुत रोचक है। मंदिर का इतिहास एक वफादार कुत्ते से जुड़ा हुआ है।
कहानी के अनुसार, सदियों पहले एक बंजारा परिवार अपने कुत्ते के साथ इस गांव में आया था। एक समय गांव में अकाल पड़ा और बंजारा साहूकार से कर्ज ले बैठा। लेकिन कर्ज वापस न चुकाने पर उसने अपना कुत्ता साहूकार के पास गिरवी रख दिया। कुछ समय बाद, साहूकार के घर चोरी हो गई और चोरों ने सारे माल को जमीन में छुपा दिया। कुत्ते ने चोरी का माल खोज निकाला और साहूकार को उस स्थान तक ले गया, जहां चोरों ने माल गाड़ा था। साहूकार ने उस स्थान से अपना सारा माल निकाल लिया और कुत्ते की वफादारी को सराहा।
कुत्ते को उसकी वफादारी के लिए साहूकार ने आजाद कर दिया और बंजारे के पास चिट्ठी भेजी, जिससे यह पता चलता था कि कुत्ते ने साहूकार के लिए इतनी बड़ी मदद की थी। लेकिन बंजारा, यह सोचते हुए कि कुत्ता साहूकार से भागकर आया है, गुस्से में आकर कुत्ते को पीट-पीटकर मार डाला।
जब बंजारे ने कुत्ते के गले में लटकी चिट्ठी पढ़ी, तो वह हैरान रह गया और उसे अपने किए पर पछतावा हुआ। उस स्थान पर उसने कुत्ते को दफनाया और बाद में वहां एक स्मारक बनवाया। इस स्मारक को समय के साथ एक मंदिर का रूप मिल गया और लोग कुकुरदेव की पूजा करने आने लगे।
मंदिर की विशेषताएं
कुकुरदेव मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा और उसके पास एक शिवलिंग है।
मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं से 15वीं शताब्दी में कराया गया था।
मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमाएं लगी हुई हैं।
इस मंदिर में सावन के महीने में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, और यहां नवरात्रि तथा शिवरात्रि के दौरान भी बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।
मंदिर की मान्यता
कुकुरदेव मंदिर की मान्यता यह है कि कुकुरदेव का दर्शन करने से न तो कुत्ते की बीमारी (कुकुरखांसी) का डर रहता है, और न ही कुत्ते द्वारा काटे जाने का खतरा होता है। कुत्ते की पूजा यहां इस बात का प्रतीक है कि कुत्ता मानव के सबसे वफादार मित्रों में से एक है।
मंदिर का विकास और पर्यटन
कुकुरदेव मंदिर को आजकल पर्यटन के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसे 1993 में पुरातत्व विभाग के अधीन लिया गया और अब यह श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बन चुका है। मंदिर का ऐतिहासिक और आस्थागत महत्व बढ़ने के साथ यहां पर्यटन भी बढ़ रहा है।


