कुहकी डंडा नृत्य” कैसे होता है?

आपने कभी कुहकी डंडा नृत्य देखा है? यह भारत के प्राचीन लोक नृत्यों में से एक अद्भुत और अनोखा नृत्य है, जो अब विलुप्त होने की कगार पर है। लेकिन यह नृत्य आज भी छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में जीवित है, जैसे बिरकोनी गांव में, जहां इस नृत्य की परंपरा आज भी पूरी तरह से निभाई जा रही है।
कुहकी डंडा नृत्य विशेष रूप से फागुन के त्यौहार के अवसर पर पशुपालक कृषकों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में कोई वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता, बल्कि संगीत की उत्पत्ति केवल कंठ से निकली आवाज़ “कुहकी” और डंडों के टकराने की ध्वनि से होती है। डंडों की चाल और ताल के साथ जैसे-जैसे नृत्य की गति तेज होती है, वैसे-वैसे नृत्य का दृश्य भी रोमांचकारी और आकर्षक होता जाता है। जनजातीय समाज में प्रचलित इस नृत्य को पुरुषों द्वारा 10-20 की संख्या में समूह बनाकर किया जाता है.
इस नृत्य में नर्तकियों के साथ-साथ गीत भी गाए जाते हैं। ये गीत लोकभाषा में होते हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं, जैसे हर्ष, विषाद और जीव की परम् गति को व्यक्त करते हैं। इन गीतों में भावनाओं का अद्भुत संगम होता है, जो नृत्य के हर आवृत्त में साफ़ झलकता है।
नृत्य करने वालों के हाथों में जो डंडा होता है उसे वे गोल घेरे में झूम-झूम कर, उछलकर, झुककर, कभी दाएं तो कभी बाएं होते हुए एक दूसरे के डंडो पर चोट मारते हैं. डंडे पर चोट पड़ने से बहुत ही कर्णप्रिय ध्वनि निकलती है, जिसे सुनकर बहुत ही आनंद की अनुभूति होती है.
बिरकोनी के कृषक सियानों ने इस लोकनृत्य को सहेज कर रखा है। वे चाहते हैं कि नई पीढ़ी भी इस लोकनृत्य में रुचि ले, इसे आगे बढ़ाए उनकी कोशिश है और इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा समझे।





