पहाड़ी कोरवा समाज में कम उम्र में मातृत्व की चुनौती, ढुकू प्रथा पर बढ़ी चिंता

सरगुजा जिले की पहाड़ी कोरवा बस्तियों में आज भी ढुकू प्रथा सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई है। इस परंपरा के तहत युवक-युवतियां अपनी मर्जी से साथ रहने लगते हैं और बाद में परिवार तथा समाज इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं। हालांकि, कम उम्र में साथ रहने और जल्दी माता-पिता बनने की बढ़ती प्रवृत्ति अब चिंता का विषय बनती जा रही है।
13-14 साल की उम्र में शुरू हो रहा पारिवारिक जीवन
सरगुजा के आसनडीह गांव की पहाड़ी बस्ती गोटीडूमर में कई ऐसे परिवार मिले, जहां लड़कियां 13-14 वर्ष की उम्र में ही अपने साथी के साथ रहने लगीं। कई युवतियां 19-20 वर्ष की उम्र तक दो से तीन बच्चों की मां बन चुकी हैं। कुछ मामलों में वर्षों से साथ रहने के बावजूद औपचारिक विवाह नहीं हुआ है, लेकिन समाज उन्हें पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, ढुकू प्रथा में लड़का और लड़की अपनी पसंद से साथ रहने लगते हैं। बाद में दोनों परिवार मिलकर विवाह भी करा सकते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं होता। इस परंपरा के कारण कम उम्र में गर्भधारण और मातृत्व के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
शिक्षा और दस्तावेजों की कमी बनी बड़ी समस्या
बस्ती में रहने वाले कई परिवारों के बच्चों की पढ़ाई जरूरी दस्तावेजों के अभाव में प्रभावित हो रही है। आधार कार्ड और राशन कार्ड नहीं बनने के कारण कई बच्चे स्कूल से दूर हैं। कई परिवारों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारियां संभालने के कारण शिक्षा पीछे छूट जाती है। कई बच्चे स्कूल जाने की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन अब तक शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ पाए हैं। दूसरी ओर, कुछ युवा अपने बच्चों को पढ़ाने और बेहतर भविष्य देने की इच्छा भी जता रहे हैं।
दिव्यांगता और जागरूकता की चुनौतियां भी सामने
गोटीडूमर बस्ती में कई ऐसे परिवार भी मिले, जहां एक या अधिक सदस्य दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। कुछ परिवारों में बोलने-सुनने या देखने में असमर्थ सदस्य हैं। हालांकि, इन स्थितियों के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है।
गांव के बुजुर्गों और स्थानीय लोगों का कहना है कि ढुकू प्रथा पर उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन नाबालिग उम्र में साथ रहने और जल्दी बच्चे होने की प्रवृत्ति चिंता का कारण बन रही है। उनका मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पहाड़ी कोरवा समाज में एक ओर पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक मान्यताएं कायम हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता के माध्यम से बदलाव की कोशिशें भी दिखाई दे रही हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परंपरा और आधुनिक सोच के बीच संतुलन किस दिशा में आगे बढ़ता है।





