625 साल पहले भी राजधानी था रायपुर, शिलालेख में मिले ऐतिहासिक प्रमाण

रायपुर का महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय सिर्फ पुरानी वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज बन चुका है। 150 साल पुराने इस संग्रहालय में सुरक्षित दुर्लभ शिलालेख, मूर्तियां, अस्त्र-शस्त्र और प्राचीन धरोहरें यह साबित करती हैं कि रायपुर सदियों पहले भी सत्ता और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।

शिलालेख से मिला 625 साल पुरानी राजधानी का प्रमाण

विक्रम संवत 1458 के एक महत्वपूर्ण शिलालेख में रायपुर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। कलचुरि शासक हरिब्रह्मदेव के शासनकाल में उनके नायक हाजिराज ने खारून नदी तट पर हटकेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना कराई थी। इस शिलालेख की 10वीं पंक्ति में ‘रायपुर’ का उल्लेख इस बात का प्रमाण माना जा रहा है कि उस दौर में भी रायपुर कलचुरि शासन की राजधानी था। वर्तमान का महादेव घाट उसी ऐतिहासिक स्थल से जुड़ा माना जाता है।

संग्रहालय में दूसरी सदी का दुर्लभ काष्ठ स्तंभ-लेख भी सुरक्षित है, जो जांजगीर-चांपा जिले के किरारी गांव स्थित हीराबांधा तालाब से मिला था। सातवाहन कालीन ब्राह्मी लिपि में लिखे इस अभिलेख को पूरे भारत में अपनी तरह का एकमात्र दुर्लभ काष्ठ स्तंभ-लेख माना जाता है।

दुर्लभ मूर्तियां और शिल्पकला बनी आकर्षण का केंद्र

संग्रहालय में रतनपुर क्षेत्र से मिली भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की दुर्लभ ‘कल्याणसुंदर’ प्रतिमा भी प्रदर्शित है। करीब 800 से 1200 साल पुरानी इस प्रतिमा में नंदी सहित विवाह दृश्य को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा 12वीं सदी की भगवान विष्णु की प्रतिमा में दशावतार का सूक्ष्म चित्रण भी दर्शकों को आकर्षित करता है।

धमतरी जिले से प्राप्त पांडुवंशी कालीन शिव द्वार-शाखा में नाग कन्या, नाग पुरुष और एकमुखी शिवलिंग की दुर्लभ आकृतियां उकेरी गई हैं। वहीं राजनांदगांव से प्राप्त 16वीं-17वीं शताब्दी की पत्थर निर्मित तीन बंदरों की मूर्तियां ‘बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो’ का संदेश देती नजर आती हैं।

150 साल पुराना संग्रहालय संभाले हुए है ऐतिहासिक विरासत

महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय की स्थापना साल 1875 में राजा महंत दिग्विजय दास ने की थी। शुरुआत में इसे घड़ी चौक स्थित कला वीथिका में संचालित किया गया था। बाद में ऐतिहासिक वस्तुओं की संख्या बढ़ने पर 1953 में राजभवन के पास नए भवन का निर्माण कराया गया।

संग्रहालय में सिरपुर, मल्हार, रतनपुर, आरंग, सिसदेवरी, डीपाडीह और भोरमदेव सहित कई ऐतिहासिक स्थलों से प्राप्त छठवीं सदी की प्रतिमाएं, मिट्टी के दीये, प्राचीन मुद्रांक, हथियार और सांस्कृतिक धरोहरें संरक्षित हैं। यहां सोने-चांदी की नक्काशी वाली शाही तलवारें और युद्ध में उपयोग होने वाले अस्त्र-शस्त्र भी प्रदर्शित किए गए हैं।

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