प्री-स्कूल को RTE से बाहर करने पर विवाद, हजारों बच्चों की शिक्षा पर असर

छत्तीसगढ़ में प्री-स्कूल कक्षाओं को शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के दायरे से बाहर करने के फैसले को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस फैसले के खिलाफ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। सरकार ने अपने निर्णय को सही ठहराते हुए आर्थिक बोझ और कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया है, जबकि याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के खिलाफ बताया है।
सरकार ने फैसले के पीछे दिए ये तर्क
राज्य सरकार का कहना है कि RTE कानून मुख्य रूप से 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए लागू होता है, जो कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को कवर करता है। प्री-स्कूल (नर्सरी, LKG, UKG) को इसमें शामिल करना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है। इसके अलावा सरकार ने यह भी कहा कि प्री-स्कूल को RTE में शामिल करने से हर साल 60 से 70 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ता है। सरकार का यह भी दावा है कि 3 से 6 वर्ष के बच्चों में ड्रॉपआउट दर अधिक होती है और इस स्तर पर RTE लागू करने से केवल नर्सरी आधारित स्कूलों की संख्या बढ़ रही है, जिससे कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ती है।
एसोसिएशन का आरोप: गरीब बच्चों के अधिकारों का हनन
प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन का कहना है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में पढ़ाई की शुरुआत प्री-स्कूल से ही होती है। यदि गरीब बच्चों को इसी स्तर पर प्रवेश नहीं मिलेगा, तो वे आगे की पढ़ाई में पीछे रह जाएंगे। उन्होंने RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) का हवाला देते हुए कहा कि जहां स्कूल प्री-प्राइमरी कक्षाएं चलाते हैं, वहां 25% आरक्षण की व्यवस्था एंट्री लेवल से लागू होनी चाहिए। इस फैसले को उन्होंने समान शिक्षा के अधिकार के खिलाफ बताया है।
कोर्ट के फैसले पर टिकी आगे की स्थिति
इस पूरे मामले का अंतिम निर्णय अब अदालत पर निर्भर है। इससे पहले एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि 25% आरक्षण केवल कक्षा 1 तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्री-प्राइमरी स्तर से ही लागू किया जाना चाहिए। यदि अदालत इसी दृष्टिकोण को अपनाती है, तो राज्य सरकार के फैसले को झटका लग सकता है। फिलहाल इस निर्णय का असर हजारों गरीब बच्चों की शिक्षा पर पड़ता दिख रहा है, जिनके लिए प्राइवेट स्कूलों में शुरुआती शिक्षा का रास्ता कठिन हो सकता है।





