गोद लेने वाली माताओं को भी मिलेगा मातृत्व अवकाश, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व अवकाश देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गोद लेने वाली महिलाओं को भी जन्म देने वाली माताओं के समान मातृत्व लाभ का अधिकार है और उन्हें इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि बच्चे की उम्र क्या है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020’ की धारा 60(4) के तहत उम्र के आधार पर किया गया भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने माना कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल जन्म से जुड़ा नहीं है, बल्कि बच्चे की देखभाल और उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने से भी जुड़ा है।
अदालत ने कहा कि एक मां के साथ यह भेदभाव नहीं किया जा सकता कि वह बच्चे को जन्म देती है या उसे गोद लेती है। चाहे बच्चा छोटा हो या बड़ा, हर स्थिति में मां और बच्चे के बीच संबंध को मजबूत करने के लिए समय की आवश्यकता होती है और इसी उद्देश्य से मातृत्व अवकाश दिया जाता है।
गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व अवकाश देने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के हित को भी सर्वोपरि बताया। कोर्ट ने कहा कि खासकर बड़े बच्चों को, जो संस्थानों से गोद लिए जाते हैं, नए परिवार में घुलने-मिलने के लिए अधिक समय की जरूरत होती है। ऐसे में मातृत्व अवकाश उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) की नीति पर भी विचार करने का आग्रह किया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें पिता की भी समान भूमिका होनी चाहिए। इससे समाज में अधिक संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण विकसित होगा।
यह फैसला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने मातृत्व लाभ कानून के उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जो गोद लेने वाली माताओं के साथ उम्र के आधार पर भेदभाव करता था। याचिका में यह भी कहा गया था कि भारत में तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने के मामले बहुत कम होते हैं, ऐसे में यह प्रावधान व्यावहारिक रूप से अनुचित है।
गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व अवकाश देने का यह फैसला देश में मातृत्व अधिकारों के विस्तार और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।





