100 साल पुरानी परंपरा: इस गांव में तिथि नहीं, मंगलवार और शनिवार को ही खेली जाती है होली

छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला ब्लॉक स्थित साल्हेओना गांव अपनी अनोखी होली परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां होली तिथि के अनुसार नहीं, बल्कि सप्ताह के दिन देखकर मनाई जाती है। गांव में होली केवल मंगलवार या शनिवार को ही खेली जाती है। यदि त्योहार इन दोनों दिनों में नहीं पड़ता, तो पूरे गांव में होली नहीं मनाई जाती।
करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव में यह परंपरा लगभग 100 वर्षों से चली आ रही है। ग्रामीणों के अनुसार, कई साल पहले होली के दिन गांव में अचानक आग लगने की घटनाएं होती थीं। आग एक घर से दूसरे घर तक फैल जाती थी, जिससे लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था। यह घटना लगातार तीन-चार वर्षों तक दोहराई गई।
बताया जाता है कि इसके बाद गांव के पूर्वज ब्रह्म अवधूत बाबाओं के पास पहुंचे। बाबाओं ने अग्निकांड से बचाव के लिए विशेष अनुष्ठान की सलाह दी। उन्होंने कहा कि शांति यज्ञ मंगलवार या शनिवार को कराया जाए और उसी दिन ग्राम देवी-देवताओं की पूजा कर होली मनाई जाए। तब से गांव में यही परंपरा निभाई जा रही है।
गांव में निर्धारित दिन से एक रात पहले विधि-विधान से पूजा कर होलिका दहन किया जाता है। अगले दिन सुबह लगभग 10 बजे से पूजा, हवन और पूर्णाहुति का कार्यक्रम होता है, जो करीब दो घंटे तक चलता है। इसके बाद लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली खेलते हैं। रंग खेलने का सिलसिला दोपहर से शाम तक जारी रहता है।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले होली के समय आग पर काबू पाना मुश्किल हो जाता था। इसी कारण यह मान्यता बनी कि पहले विधि-विधान से पूजा की जाए, उसके बाद ही रंग खेला जाए। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा का पालन न करने पर अनहोनी हो सकती है।
गांव के पंचों का कहना है कि पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा को नई पीढ़ी भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रही है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बिना किसी बाधा के जारी है।





