खून-पसीने से सींचे आशियानों पर सिस्टम का बुलडोज़र- लिंगियाडीह में 80 दिनों से सड़क पर सिसकती ममता, आंदोलन जारी

बिलासपुर (लिंगियाडीह)। लिंगियाडीह की वे गलियां, जहां कभी अभाव के बीच भी मुस्कानें बसती थीं, आज मातम में डूबी हैं। जिन महिलाओं ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर, साफ-सफाई कर एक-एक ईंट जोड़ते हुए अपने आशियाने खड़े किए थे, वही महिलाएं आज बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ पिछले 80 दिनों से धूल-धुएं के बीच सड़क पर बैठने को मजबूर हैं।
चुनाव के दौरान बड़े मंचों से दिया गया वादा -“घर नहीं टूटेगा, जहां टूटेगा वहीं घर बनेगा” अब इन गरीबों की आंखों में तैरते आंसुओं में घुल गया है। 60 साल से बसे घर पल भर में ‘अवैध’ घोषित कर दिए गए, लेकिन क्षेत्रीय विधायक से लेकर सत्ता के बड़े नेताओं तक किसी ने भी इन बिलखती महिलाओं और बुज़ुर्गों की सुध लेना जरूरी नहीं समझा।
रहवासियों का सवाल सीधा है- क्या उनका पट्टा सिर्फ वोट लेने का कागज था? जिस कॉम्प्लेक्स के लिए उनके घर उजाड़े जा रहे हैं, क्या उसमें इन गरीबों के बच्चों के लिए भी कोई कोना होगा? अपनी ही जमीन पर बेगाने किए गए ये लोग अब चुप बैठने के बजाय आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जिनके सिर से छत छिन जाए, उनके पास खोने को कुछ नहीं बचता। न्याय और पुनर्वास की मांग के साथ लिंगियाडीह के रहवासी सड़क पर डटे हैं क्योंकि तिल-तिल मरने से बेहतर है, अधिकारों के लिए खड़ा होना।





