जीरो डेप्रिसिएशन इंश्योरेंस को लेकर फैली 7 बड़ी गलतफहमियाँ, जानिए क्या है सच्चाई

नई दिल्ली:आज के समय में वाहन मालिकों के बीच जीरो डेप्रिसिएशन (Zero Depreciation) इंश्योरेंस तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। हालांकि, इसे लेकर लोगों के मन में कई तरह की गलतफहमियाँ बनी हुई हैं, जिनके कारण सही इंश्योरेंस चुनने में परेशानी आती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पॉलिसी लेने से पहले इन मिथकों को समझना बेहद जरूरी है।
सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि जीरो डेप्रिसिएशन कवर लेने पर क्लेम के समय किसी भी तरह का खर्च नहीं देना पड़ता। जबकि सच्चाई यह है कि यह कवर सिर्फ वाहन के पार्ट्स पर लगने वाली डेप्रिसिएशन को हटाता है, अनिवार्य डिडक्टिबल और कुछ अन्य खर्च वाहन मालिक को खुद उठाने होते हैं।
कई लोग यह भी मानते हैं कि जीरो डेप्रिसिएशन इंश्योरेंस केवल नई कार या बाइक के लिए ही होता है, लेकिन हकीकत में कई इंश्योरेंस कंपनियां इसे 3 से 5 साल तक पुरानी गाड़ियों पर भी उपलब्ध कराती हैं।
एक और आम भ्रम यह है कि यह कवर सामान्य इंश्योरेंस पॉलिसी में अपने आप शामिल होता है। जबकि वास्तव में जीरो डेप्रिसिएशन एक ऐड-ऑन कवर है, जिसे अलग से चुनना पड़ता है और इसके लिए अतिरिक्त प्रीमियम देना होता है।
लोग अक्सर यह भी सोचते हैं कि जीरो डेप्रिसिएशन इंश्योरेंस हर तरह के नुकसान को कवर करता है। लेकिन यह कवर केवल रिपेयर के दौरान बदले गए पार्ट्स पर डेप्रिसिएशन की कटौती को कम या खत्म करता है। टोइंग चार्ज, इंजन डैमेज या कंज्यूमेबल्स जैसे खर्च इसके अंतर्गत नहीं आते।
इसके अलावा यह मान लेना भी गलत है कि हर क्लेम पर 100 प्रतिशत राशि मिलती है। क्लेम की राशि पॉलिसी की शर्तों और नुकसान के प्रकार पर निर्भर करती है।
कुछ लोगों को लगता है कि जीरो डेप्रिसिएशन कवर बहुत महंगा और बेकार है, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार गंभीर एक्सीडेंट की स्थिति में यह कवर वाहन मालिक को बड़ी आर्थिक राहत दे सकता है।
अंत में, यह भी जरूरी है कि सभी इंश्योरेंस कंपनियों की शर्तें एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए पॉलिसी लेने से पहले नियम, शर्तें और कवरेज को ध्यान से पढ़ना बेहद जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर किसी तरह की परेशानी न हो।





