अर्थव्यवस्था मजबूत होने से अब लगे लौटने नौकरी करने विदेश गए युवा, सुधा मूर्ति ने साझा किए अनुभव

चार से पांच दशक पहले पढ़ाई पूरी होते ही युवा भारत से अमेरिका-यूरोप में नौकरी जाते थे। उनमें से बहुत कम लौटकर अपने देश में आते थे। मगर, अब धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलने लगी हैं। वहां से तुलना करने के बाद भारत में भी विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियां और व्यवसाय से जुड़े अवसर बढ़ गए हैं।

ऐसा कुछ कारणों से संभव हुआ है, क्योंकि लोगों में विदेशों के प्रति आकर्षण कम हुआ है। दूसरा सरकार की नीतियों ने भारत में निवेश बढ़ाया है। साथ ही अर्थव्यवस्था भी मजबूत हुई है। ये बातें मुख्य अतिथि इंफोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने कहीं।

बच्चों को अच्छी परवरिश देना जरूरी

रविवार को डेली कॉलेज में फिक्की फ्लो द्वारा कार्यक्रम आयोजित किया गया। वहां उन्होंने अपने जीवन से जुड़े अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि नौकरीपेशा अभिभावकों के लिए बच्चों को अच्छी परवरिश देना बहुत मुश्किल होता है। इस परिस्थिति में अधिकांश महिलाएं अपने भविष्य को दांव पर लगती है और बच्चों की देखभाल करती है।

ऐसी स्थिति में पति को भी अपनी पत्नी का भरपूर सहयोग करना चाहिए, क्योंकि बच्चों की जिम्मेदारी दोनों की रहती है। 14 साल तक बच्चों के साथ दोनों अच्छे से समय बीताएं। तभी उनके भविष्य को सही दिशा में आकार दिया जा सकेगा।

पहले परिवार फिर नौकरी को दें प्राथमिकता

बच्चे छोटे होने तक महिलाएं पहले परिवार और बाद में नौकरी को प्राथमिकता दें। वे कहती है कि शादी के बाद महिलाओं को अपनी लाइफ को लेकर काफी बैलेंस बनाना पड़ता है। तभी दोनों परिवार और भविष्य में तालमेल बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि भले ही आपका परिवार आर्थिक रूप से सक्षम है। मगर, बच्चों की हर जिद पूरी करने की बजाए वास्तविकता से रूबरू करवाना चाहिए। एक मर्तबा बच्चे अपने दोस्त की जन्मदिन की पार्टी से लौटे थे। उन्होंने भी हमारे सामने जन्मदिन पर पार्टी रखने की बात कही।

उसके बाद दोनों बच्चों को हम बस्ती में लेकर गए और वहां रहने वाले बच्चों के बारे में बताया। उन्हें समझाया कि होटल में हजारों रूपये खर्च करना बेफिजूल है। बल्कि यह राशि इन बच्चों के जीवन को सुधारने में लगाई जा सकती है।

52 साल की उम्र में लिखी पहली किताब

उन्होंने कहा कि कन्नड़ भाषा से मैंने अपना अध्ययन पूरा किया है। परिवार में हम तीन बहनें थीं। मां मुझे सप्ताहभर की दिनचर्या के बारे में 25 लाइन में लिखने को कहती थीं। पूछने पर उन्होंने कहा कि बाकी दोनों बहनें आर्ट्स में अच्छी हैं और तुम्हारा कहानी कहने का अंदाजा अच्छा है।

इसके चलते मुझे किताबें लिखने में रूचि बढ़ी। 52 वर्ष की उम्र में मैंने पहली किताब अंग्रेजी में लिखी। अब तक 46 किताबें लिख चुकी हूं, जो अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। करीब 70 लाख कॉपियां बिक चुकी हैं।

जर्नलिस्ट ने लिखने के लिए किया प्रेरित

सुधा मूर्ति कहती है कि अंग्रेजी में लिखने के लिए मुझे एक जर्नलिस्ट ने प्रेरित किया था। मैंने उन्हें कहा था कि मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं है। जवाब में उन्होंने कहा कि आप लिखती बहुत सरल और सुंदर हो। यही अंग्रेजी में लिखना शुरू करें। लोग ज्यादा पसंद करेंगे।

पहली किताब प्रकाशित होने के बाद पाठकों ने मुझे पसंद किया। बाद में उनकी प्रतिक्रिया आई और बोले कि कहानी लिखना का तरीका अच्छा है। भारत में ऐसी ही सरल अंग्रेजी पसंद की जाती है।

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