लगातार सत्ता में होने के बावजूद असम में जनसंख्या संतुलन को लेकर क्यों चिंतित हैं मुख्यमंत्री सरमा

असम में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य में दो बार से सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर जीत की तैयारी में जुटी है, लेकिन इसी बीच मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा बार-बार जनसंख्या संरचना को लेकर चिंता जता रहे हैं। खास तौर पर वह हिंदू आबादी की तुलना में मुस्लिम आबादी की तेज़ बढ़ोतरी का मुद्दा उठा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने हाल के दिनों में सार्वजनिक मंचों से यह कहा है कि राज्य में हिंदुओं की जन्म दर लगातार घट रही है, जबकि मुस्लिम समुदाय में यह अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है। इसी चिंता के चलते उन्होंने हिंदुओं से दो या तीन बच्चे पैदा करने की अपील की है। उनका तर्क है कि यदि हिंदू परिवारों में जन्म दर नहीं बढ़ी तो भविष्य में सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
असम में भारतीय जनता पार्टी 2016 से सत्ता में है और 2021 में भी उसने सरकार बनाई। इसके बावजूद जनसांख्यिकीय बदलाव का मुद्दा पार्टी और मुख्यमंत्री के बयानों में लगातार प्रमुखता से सामने आता रहा है। मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी का अनुपात तेज़ी से बढ़ा है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं।
जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011 के अनुसार असम की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत थी, जबकि हिंदुओं की संख्या लगभग 61 प्रतिशत रही। भाजपा का दावा है कि वर्ष 2001 में जहां छह जिले मुस्लिम बहुल थे, वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर नौ हो गई और अब यह आंकड़ा और बढ़ चुका है। धुबरी, बारपेटा, गोलपारा, करीमगंज और हैलाकांडी जैसे जिले लंबे समय से मुस्लिम बहुल माने जाते हैं।
हालांकि दूसरी ओर सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं कि असम में कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2018 में जहां यह दर 2.2 थी, वहीं 2023 तक यह घटकर 2.0 पर आ गई है। ग्रामीण इलाकों में यह दर थोड़ी अधिक है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 1.3 से भी नीचे पहुंच चुकी है। इससे यह संकेत मिलता है कि कुल मिलाकर राज्य में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी हो रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जनसंख्या और घुसपैठ जैसे मुद्दे चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन और विपक्षी महाजोट के वोट शेयर में ज्यादा अंतर नहीं रहा था, लेकिन सीटों के मामले में भाजपा को बढ़त मिली। ऐसे में पार्टी एक बार फिर हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश में इन मुद्दों को आगे बढ़ा रही है।
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री सरमा के बयान यह संकेत देते हैं कि असम की राजनीति में जनसांख्यिकीय बदलाव और पहचान से जुड़े सवाल एक बार फिर केंद्र में रहने वाले हैं।





