अंबेडकर ने क्यों छोड़ा हिंदू धर्म? जानिए उस फैसले की वजह..

“मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।”
ये शब्द थे भारत के संविधान निर्माता और दलितों के अधिकारों की बुलंद आवाज डॉ. भीमराव अंबेडकर के, जिन्हें उन्होंने न सिर्फ कहा… बल्कि अपने जीवन में उतार कर भी दिखाया।
कब लिया धर्म परिवर्तन का फैसला?
13 अक्टूबर 1935, बॉम्बे प्रेसीडेंसी के एक ऐतिहासिक सम्मेलन में डॉ. अंबेडकर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से एलान किया कि
“मैंने हिंदू धर्म छोड़ने का निर्णय ले लिया है।” इस घोषणा के पीछे एक नहीं, कई गहरे सामाजिक कारण थे।
जाति प्रथा – अंबेडकर के फैसले की जड़
बाबा साहेब का पूरा जीवन जातिगत भेदभाव और छुआछूत की पीड़ा झेलते हुए बीता।
उनका मानना था कि हिंदू धर्म में जन्म से ही व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तय कर दी जाती है, जो इंसान के विकास के रास्ते बंद कर देती है।
अंबेडकर ने कहा था
“मुझे वह धर्म चाहिए जो स्वतंत्रता, समानता और करुणा सिखाता है। धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए।”
क्यों चुना बौद्ध धर्म?
डॉ. अंबेडकर ने वर्षों तक ईसाई, इस्लाम, सिख, बौद्ध और यहूदी धर्मों का गहन अध्ययन किया।
इस विश्लेषण के बाद उन्होंने पाया कि बौद्ध धर्म ही ऐसा धर्म है,
जो जाति व्यवस्था को नकारता है और इंसान को समता, करुणा और आत्म-उत्थान का मार्ग दिखाता है।
14 अक्टूबर 1956 – धर्म परिवर्तन
नागपुर के दीक्षाभूमि में लाखों अनुयायियों के साथ बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। कहा जाता है कि उस दिन 3 लाख 65 हजार से ज्यादा लोगों ने उनके साथ धर्म परिवर्तन किया था।यह न सिर्फ धार्मिक बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रतीक बन गया।





