Et af de længst eksisterende offshore-navne er stadig Queenvegas selvom konkurrencen er blevet hård. I sammanställningar av nyare alternativ förekommer Slotser casino som ett av flera mindre kända varumärken. Bland mindre etablerade sajter återfinns Newlucky casino som har en relativt enkel webbplats men ett brett spelutbud. För dem som vill veta mer om sajter utan begränsningar kan man klicka här och bläddra bland alternativen. Among lion-themed brand entries is www.leoncasino.nu which sits alongside several similar names. För spelare som är nyfikna på bonus buy-mekaniken kan man läs mer här för en bredare överblick.

कौन है भगवान बिरसा मुंडा, क्यों माना जाता है इन्हें भगवान

रायपुर। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर सन 1875 को झारखंड के छोटे से गांव उलिहातू में एक सामान्य परिवार में हुआ था।  बिरसा मुंडा के माता-पिता नागपुर पठार क्षेत्र की मुंडा जनजाति से आते थे और उनके परिवार की स्थिति काफी खराब थी। इनके माता-पिता दोनों दूसरे गांव में मजदूरी का काम करते थे, जिसके कारण उनकी देखभाल के लिए इनको मामा के पास भेज दिया था। वहां उन्होंने भेड़ चराने के साथ गणित और अक्षर ज्ञान की शिक्षा प्राप्त की।

 

कुछ समय के बाद इनका दाखिला एक मिशनरी स्कूल में हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार इनका परिवार ईसाई धर्म स्वीकार कर चुका था और इनके पिता एक धर्म प्रचारक भी बन गए थे। बिरसा मुंडा को भी ईसाई धर्म में शामिल कर लिया गया और इनका नाम रखा गया दाऊद मुंडा। कुछ समय बाद इनका संपर्क एक ईसाई धर्म प्रचारक से हुई और बात-बात में उन्होंने बिरसा से कुछ ऐसा कहा जो इनको बुरा लगा। इसके बाद बिरसा ने वापस आदिवासी तौर तरीकों में लौटने का मन बनाया और उन्होंने मुंडा समुदाय के लोगों को संगठित करके जनजाति समाज में सुधारों का काम किया।

 

रिपोर्ट के अनुसार इन्होंने राजनीतिक शोषण के विरुद्ध लोगों को जागरूक किया। इस तरह साल सन 1894 में उन्होंने पहली बार आंदोलन में कदम रखा। साल 1894 में बिरसा मुंडा सरदार आंदोलन में शामिल हुए जिसका उद्देश्य आदिवासियों की ज़मीन और वन संबंधी अधिकारों की मांग करना था। आंदोलन के दौरान उनको लगा कि इस आंदोलन को न तो ईसाईयों की तरफ से समर्थन किया जा रहा है और न ही जनजातियों की तरफ से। इससे उन्होंने एक नए आध्यात्मिक संगठन ‘बिरसाइत’ को शुरू किया। इसका मुख्य काम जनजातियों को जागरूक करना था।

 

‘अबुआ दिशोम’ यानी हमारा देश और ‘अबुआ राज’ यानी हमारा राज नारे का बिरसा मुंडा ने आजादी के शंखनाद की तरह इस्तेमाल किया। यह नारा एक तरह से आदिवासियों की मांग का नारा बन गया था। बिरसा मुंडा का संदेश था कि आदिवासियों को बाहरी शासन या किसी भी प्रकार के शोषण को स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने ही शासन के तहत स्वतंत्र और स्वाभिमानी जीवन जीना चाहिए।

 

आज बिरसा मुंडा को न सिर्फ झारखंड बल्कि देश के कई हिस्सों में भगवान का दर्जा दिया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बिरसाइत धर्म की स्थापना की। इसमें पहली बार उनके द्वारा 12 शिष्यों को इस धर्म के प्रचार की जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य सोमा मुंडा को धर्म-पुस्तक सौंपी। इस तरह बताया जाता है कि उन्होंने साल 1894-95 के बीच अपने बिरसाइत धर्म की स्थापना की थी। आज बिरसा को लाखों लोग भगवान की तरह मानते हैं और उनके इस धर्म को मानने वालों की संख्या हजारों में होगी। यह धर्म खूंटी, सिमडेगा और चाईबासा ज़िले में विशेष रूप से देखने को मिलता है।

 

आज बिरसा मुंडा को आदिवासियों के महानायक के रूप में याद किया जाता है, एक ऐसा महानायक जिसने अपने क्रांति से आदिवासियों को उनके अधिकार और उनमें सुधार लाने लिए संघर्ष किया। जब पूरा आदिवासी समाज ब्रिटिश शासकों ,जमींदारों, और जागीरदारों  शोषण के तले दबा हुआ था, उस समय उन्होंने इस पूरे समाज को उठाने और एक नई जिंदगी देने का काम किया था।

 

बिसरा मुंडा ने अपने छात्र काल में ही अंग्रेज शासकों की तरफ से अपने समाज पर किए जा रहे जुल्म को लेकर चिंतत थे। आखिरकार उन्होंने अपने समाज की भलाई के लिए लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने की ठानी और उनके नेतृत्वकर्ता बन गए। उस दौरान साल 1894 में छोटानागपुर में भयंकर अकाल और महामारी ने पांव पसारा। उस समय नौजवान बिरसा मुंडा ने पूरे मनोयोग से लोगों की सेवा की।

 

बिरसा मुंडा की गणना महान क्रांतिकारी और देशभक्तों में की जाती है। भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक रहे, जिन्होंने अपने क्रांतिकारी चिंतन से 19वीं शताब्दी की शुरुआत में ना सिर्फ झारखंड बल्कि देश में बसने वाले आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नये सामाजिक और राजनीतिक युग की नींव रखी। अंग्रेजी सरकार के काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य को सांसत में डाल दिया।

 

बिरसा मुंडा ने आर्थिक स्तर पर सुधार के लिए आदिवासी समाज को जमींदारों के आर्थिक शोषण से मुक्त कराने की दिशा में कदम बढ़ाया। बिरसा मुंडा ने जब सामाजिक स्तर पर आदिवासियों में चेतना पैदा कर दी तो आर्थिक स्तर पर सारे आदिवासी शोषण के विरुद्ध स्वयं ही संगठित होने लगे। राजनीतिक स्तर पर आदिवासियों को संगठित करने से इस समाज में चेतना की चिंगारी सुलगा दी। जिससे आजादी के संग्राम में इसे आग बनने में देर नहीं लगी। आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग हुए और अंग्रेजों के विरूद्ध व्यापक आंदोलन छेड़ दी।

 

सन 1894 में बिरसा मुंडा ने उनके नेतृत्व की कमान संभाली. आदिवासियों ने बेगारी प्रथा के विरुद्ध जबर्दस्त आंदोलन किया। अंग्रेजों के खिलाफ लगान माफी के लिए आंदोलन की शुरुआत कर दी। जिससे जमींदारों के घर से लेकर खेत तक भूमि का कार्य रूक गया. सामाजिक स्तर पर आदिवासियों के इस जागरण से जमींदार और तत्कालीन ब्रिटिश शासन बौखला गया। इसके साथ साथ समाज नयी चेतना जगने से आडंबर और झाड़ फूंक करने वालों भी आफत में पड़ गये। भगवान बिरसा मुंडा के सामाजिक अभियान के कारण अंग्रेजी सरकार घबरा गयी और उनके आंदोलन के दमन का प्रयास किया. अंग्रेजों बिरसा मुंडा को पकड़वाने के लिए उस समय 500 रुपये का इनाम रखा था। इसके अलावा लोगों को प्रलोभन भी दिया कि जो भी बिरसा मुंडा के बारे में बताएगा वो लगान मुक्त हो जाएगा और उसे जमीन का पट्टा भी दिया जाएगा।

 

इसी बीच 22 अगस्त सन 1895 को बिरसा मुंडा को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया. उन्हें 2 साल की कठोर कारावास की सजा दी और 50 रुपये का जुर्माना भी लगाया. जुर्माना ना देने के कारण वो करीब ढाई साल बाद हजारीबाग जेल से रिहा हुए और फिर से अपने जन आंदोलन में जुट गये। सन 1897 से 1900 के बीच मुंडा समाज और अंग्रेजी सिपाहियों के बीच लगातार युद्ध होते रहे. बिरसा मुंडा और उसके समर्थकों ने अंग्रेजी सेना की नाक में दम कर दिया। अगस्त सन 1897 में बिरसा मुंडा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाना पर धावा बोला।

 

सन 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं के साथ अंग्रेजी सेना की लड़ाई हुई। जिसमें अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जनवरी सन 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर बिरसा मुंडा एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान अंग्रेजी सैनिकों ने हमला कर दिया, इस संघर्ष में काफी संख्या में महिलाएं और बच्चे मारे गये. इस बाद में बिरसा मुंडा के कई शिष्यों की गिरफ्तारियां भी हुईं। 3 मार्च सन 1900 को अंग्रेजी सेना ने चक्रधरपुर से बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद उन्हें रांची जेल लाया गया। रांची जेल आने के दौरान वो काफी बीमार पड़ गये, उन्हें खून की उल्टी होने लगी. इसी बीमारी में बिरसा मुंडा ने 9 जून सन 1900 को रांची जेल में अंतिम सांस ली।

 

आदिवासियों के महानायक बिरसा मुंडा, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में अपने क्रांतिकारी और समाज सुधार गतिविधियों से आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर रख दी। झारखंड में उन्हें धरती आबा की संज्ञा दी गयी है। युवा अवस्था में उनकी चेतना पर अंधविश्वास, सामाजिक रीति-रिवाज और अंग्रेजी शासन ने गहरा असर डाला। बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आचरण के धरातल पर आदिवासी समाज अंधविश्वासों की चपेट में जकड़ता जा रहा है। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि सामाजिक कुरीतियों के कोहरे ने आदिवासी समाज को ज्ञान के प्रकाश से वंचित कर दिया है। धर्म के बिंदु पर आदिवासी कभी मिशनरियों के प्रलोभन में आ जाते हैं तो कभी ढकोसलों को ही ईश्वर मान लेते हैं। आदिवासी समाज को अंधविश्वास के चंगुल से छूटकारा दिलाने के लिए उन्हें स्वच्छता और संस्कार का पाठ पढ़ाया और शिक्षा का महत्व समझाया।

 

भगवान बिरसा मुंडा के बताए मार्ग पर चलने को बिरसाइत कहा गया। आज भी उनके शिष्य इस धर्म का पालन करते हैं। बिरसा मुंडा आदिवासियों के भगवान की तरह पूजे जाते हैं। उनकी पूरी जीवन आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए समर्पित था। अंग्रेजों के विरूद्ध आंदोलन के लिए भी उन्होंने आदिवासियों को प्रेरित किया। बिरसा मुंडा प्रगतिशील चिंतक और एक सुधारवादी नेता रहे. उन्होंने अपने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, नशा और जीव हत्या के विरूद्ध मोर्चा खोलकर जन जागरण अभियान शुरु किया। उन्होंने अपने आंदोलन के कुछ सुधारवादी सूत्र विकसित किए। उन्होंने लोगों को समझाया कि जीव हत्या ठीक नहीं है बलि देना गलत है, सभी जीवों से हम प्रेम करें, उनके प्रति दयाभाव रखें। उन्होंने आदिवासी समाज को शराब का सेवन करने से भी मना किया। बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज की एकता और संगठन पर जोर दिया। बिसरा मुंडा के संघर्ष से लेकर सफलता तक की कहानी आपको कैसी लगी, हमें कमेंट करके जरूर बताएं और वीडियो को लाइक और शेयर करें, ताकि इतिहास से जुड़ी तमाम ख़बरों से हम आपको अपडेट कर सकें।

Show More
Follow Us on Our Social Media
Back to top button
जम्मू-कश्मीर में बारिश से अपडेट सोनम ने ही राजा को दिया था खाई में धक्का… आरोपियों ने बताई सच्चाई
जम्मू-कश्मीर में बारिश से अपडेट सोनम ने ही राजा को दिया था खाई में धक्का… आरोपियों ने बताई सच्चाई