Shashi Tharoor: शशि थरूर होंगे देश के अगले उपराष्ट्रपति?
Shashi Tharoor: सियासी गलियारों में हलचल तेज़

रायपुर. उपराष्ट्रपति चुनाव की, जो 9 सितंबर 2025 को होने वाला है.. यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद सियासी गलियारों में हलचल मच गई है.. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है यह कयास कि सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इस बार एक अप्रत्याशित कदम उठाने की सोच रही है.. तो वह अप्रत्याशित कदम क्या हो सकता है? यह संभावना कितनी वास्तविक है और इसके पीछे के राजनीतिक समीकरण क्या हो सकते हैं।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 66 के तहत, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—के सदस्यों द्वारा गुप्त मतदान के जरिए किया जाता है। इस बार कुल 782 सांसद मतदान में हिस्सा लेंगे, जिसमें बहुमत के लिए 391 वोटों की आवश्यकता होगी। एनडीए के पास लोकसभा में 293 और राज्यसभा में 129 सांसदों का समर्थन है, यानी कुल 422 वोट, जो बहुमत से कहीं अधिक है। इस संख्याबल के आधार पर यह स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ गठबंधन का उम्मीदवार जीत का प्रबल दावेदार होगा।
जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने, जो उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर दिया, कई सवाल खड़े किए हैं.. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके इस्तीफे के पीछे केंद्र सरकार के साथ मतभेद भी हो सकते हैं.. यह पहला मौका है जब किसी उपराष्ट्रपति ने अपने कार्यकाल के बीच में इस्तीफा दिया है, जिससे यह चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो गया है..
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सत्तारूढ़ एनडीए द्वारा शशि थरूर को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की चर्चा जोरों पर है। शशि थरूर, जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद हैं, अपनी बौद्धिक छवि, वैश्विक कद, और भाषण कला के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक विपक्षी नेता को सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा इस तरह का प्रस्ताव देना अपने आप में एक अभूतपूर्व कदम होगा।
हालांकि शशि थरूर ने स्वयं इस बारे में कहा है कि उन्हें नहीं पता कि अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा, लेकिन यह तय है कि वह सत्तारूढ़ दल का नामित उम्मीदवार होगा.. उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार विपक्ष से सलाह-मशविरा करेगी, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा, “कौन जाने ऐसा होगा भी या नहीं..” यह बयान उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, लेकिन उनके नाम की चर्चा ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है..
एनडीए द्वारा शशि थरूर जैसे विपक्षी नेता को चुनने की संभावना कई मायनों में एक रणनीतिक कदम हो सकती है.. कुछ सूत्रों का कहना है कि एनडीए इस बार दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर से किसी चेहरे को उपराष्ट्रपति बनाना चाहता है ताकि क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समावेश का संदेश दिया जा सके.. शशि थरूर, जो केरल से आते हैं, इस रणनीति में फिट बैठ सकते हैं.. उनकी वैश्विक छवि और दक्षिण भारत से संबंध एनडीए को दक्षिणी राज्यों में अपनी पैठ बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, जहां बीजेपी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम है..
थरूर को उम्मीदवार बनाकर एनडीए विपक्ष, खासकर कांग्रेस, में दरार डाल सकता है.. थरूर कांग्रेस के भीतर एक प्रखर लेकिन कभी-कभी अलग-थलग रहने वाले नेता माने जाते हैं। हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संसद में बहस के दौरान कांग्रेस ने उन्हें वक्ताओं की सूची में शामिल नहीं किया, जिस पर उन्होंने ‘मौनव्रत’ की टिप्पणी की थी। यह दर्शाता है कि कांग्रेस के भीतर उनकी स्थिति हमेशा सहज नहीं रही है.. ऐसे में, एनडीए का यह कदम कांग्रेस के आंतरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है.. उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक और गरिमामय होता है, और एनडीए शायद एक ऐसे उम्मीदवार को चुनना चाहता है जो व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर सके.. थरूर की बौद्धिक और कूटनीतिक छवि उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाती है..
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस चुनाव में एक साझा उम्मीदवार उतारने की योजना बना रहे हैं। लेकिन एनडीए के संख्याबल को देखते हुए उनकी जीत की संभावना कम है। शशि थरूर ने स्वयं कहा है कि “परिणाम लगभग तय है” और यह सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में जाएगा.. फिर भी, विपक्ष के लिए यह चुनाव केवल जीत-हार का सवाल नहीं है, बल्कि एक वैचारिक लड़ाई का अवसर है..
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी एक ऐसे उम्मीदवार को चुनना जो एनडीए के संभावित उम्मीदवार, खासकर अगर वह थरूर जैसे कद के नेता हों, को टक्कर दे सके.. साथ ही, अगर थरूर वाकई एनडीए के उम्मीदवार बनते हैं, तो विपक्ष के लिए यह एक जटिल स्थिति होगी, क्योंकि थरूर कांग्रेस के अपने नेता हैं.. ऐसे में विपक्ष को यह तय करना होगा कि क्या वे थरूर के खिलाफ उम्मीदवार उतारेंगे या फिर इस स्थिति को स्वीकार करते हुए एक रणनीतिक चुप्पी अपनाएंगे।
शशि थरूर की उम्मीदवारी कई मायनों में अनूठी होगी.. संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय तक सेवा और उनकी लेखन क्षमता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई है.. उपराष्ट्रपति के रूप में वह भारत की छवि को और मजबूत कर सकते हैं.. उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है, और थरूर की वाकपटुता और संसदीय प्रक्रियाओं की समझ इस भूमिका के लिए उपयुक्त है.. थरूर की छवि एक ऐसे नेता की है जो विचारधारा से ज्यादा तर्क और बौद्धिकता को महत्व देते हैं, जो उन्हें सर्वदलीय स्वीकार्यता दिला सकता है।
यह उपराष्ट्रपति चुनाव केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सियासी शतरंज का खेल है, जहां हर चाल के पीछे गहरी रणनीति छिपी है.. शशि थरूर का नाम इस दौड़ में एक आश्चर्यजनक मोड़ ला सकता है, जो न केवल एनडीए की रणनीति को बल्कि विपक्ष की एकता को भी प्रभावित करेगा.. अगर यह कयास सच साबित होता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण होगा, जहां सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच एक अप्रत्याशित सहमति देखने को मिल सकती है.. लेकिन सवाल यह है कि क्या एनडीए वाकई इतना बड़ा जोखिम लेगा? क्या शशि थरूर इस भूमिका को स्वीकार करेंगे? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या विपक्ष इस स्थिति में एकजुट होकर कोई प्रभावी रणनीति बना पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे। तब तक, सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म रहेगी।





