छत्तीसगढ़ के सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी, 70 प्रतिशत पद खाली

छत्तीसगढ़ में सरकारी सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी अब राज्य के स्वास्थ्य तंत्र के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। रायपुर के दाऊ कल्याण सिंह पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च सेंटर और बिलासपुर के कुमार साहब स्व. श्री दिलीप सिंह जूदेव सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में स्वीकृत 135 पदों में से 95 पद खाली हैं, यानी करीब 70 प्रतिशत पदों पर नियुक्ति नहीं हो पाई है।
इस कमी का सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। कई विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं होने के कारण मरीजों को या तो सामान्य चिकित्सकों के भरोसे छोड़ दिया जा रहा है या फिर उन्हें रेफर करना पड़ता है। रायपुर के डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल से पिछले एक साल में छह से अधिक डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हैं, जिससे संकट और गहरा गया है।
राज्य के 10 सरकारी मेडिकल कॉलेजों और एक डेंटल कॉलेज में भी स्थिति चिंताजनक है। यहां स्वीकृत 2,160 पदों में से 1,155 पद रिक्त हैं। यानी लगभग आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण सुपर स्पेशलिटी वार्ड केवल नाम के रह गए हैं।
जानकारों के अनुसार, एमबीबीएस सीटों में वृद्धि के बावजूद पीजी सीटों की कमी के चलते विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार नहीं हो पा रहे हैं। वर्तमान में राज्य में 10 सरकारी और 4 निजी मेडिकल कॉलेज संचालित हैं, जिनमें एमबीबीएस की 2,180 सीटें हैं, लेकिन पीजी की केवल 311 सरकारी और 186 निजी सीटें हैं।
इसके साथ ही, सरकारी बांड नियम भी डॉक्टरों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। इस नियम के कारण कई युवा डॉक्टर सुपर स्पेशलिटी कोर्स करने से वंचित रह जाते हैं। डॉक्टरों में असुरक्षा की भावना भी गहराती जा रही है क्योंकि उन्हें संविदा पर कार्य करना पड़ता है, जबकि नियमित भर्ती प्रक्रिया वर्षों से लंबित है।
मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में स्वशासी समिति के माध्यम से नियमित भर्ती की व्यवस्था है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह प्रक्रिया न्यायालय में विचाराधीन है।
जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रेशम सिंह के अनुसार, “एमबीबीएस के बाद पीजी सीटें सीमित हैं और बांड नियम ने स्थिति और जटिल बना दी है। डॉक्टरों को स्थायी नियुक्ति नहीं मिल रही, जिससे वे दूसरे राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं।”
चिकित्सा शिक्षा आयुक्त शिखा राजपूत तिवारी ने कहा है कि डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है और भर्ती नियमों को लेकर जल्द निर्णय लिया जाएगा।
यदि समय रहते स्थायी नियुक्तियां और पीजी सीटों में बढ़ोतरी नहीं की गई, तो छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर संकट में जा सकती हैं।





