पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण पर अब तक नहीं निकल सका समाधान, भर्तियां भी रहीं प्रभावित

मध्य प्रदेश में पदोन्नति और अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़े मुद्दे लंबे समय से सुलझ नहीं पाए हैं। यह दोनों ही विषय वर्षों से अदालतों में लंबित हैं, जिसके चलते राज्य के हजारों अधिकारी-कर्मचारी और युवा प्रभावित हो रहे हैं। पदोन्नति में आरक्षण के विवाद के कारण 80 हजार से अधिक अधिकारी और कर्मचारी बिना पदोन्नति पाए ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
वर्ष 2002 के पदोन्नति नियमों को हाई कोर्ट जबलपुर ने 2016 में विधिसंगत न मानते हुए निरस्त कर दिया था। इसके बाद सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां से मामला अब तक विचाराधीन है। इसी कारण राज्य में नियमित पदोन्नतियां वर्षों से रुकी हुई हैं। कर्मचारियों की नाराजगी को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने विकल्प के तौर पर पात्र अधिकारियों और कर्मचारियों को उच्च पद का प्रभार देने की व्यवस्था लागू की, लेकिन इससे उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल सका।
इस बीच नए पदोन्नति नियम बनाने के प्रयास भी किए गए। वरिष्ठ अधिवक्ताओं से नियमों का प्रारूप तैयार कराया गया और समिति गठित कर सभी पक्षों की राय ली गई, लेकिन व्यावहारिक समाधान नहीं निकल सका। सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर पदोन्नति नियम-2025 तैयार किए गए और उन्हें लागू भी कर दिया गया, लेकिन इनमें आरक्षण से जुड़े प्रावधानों को लेकर फिर से कानूनी अड़चन सामने आ गई। मामला हाई कोर्ट में सुनवाई के अधीन है, जहां अगली सुनवाई 16 दिसंबर को प्रस्तावित है।
ओबीसी आरक्षण का मुद्दा भी इसी तरह उलझा हुआ है। वर्ष 2019 में सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला लिया गया था, लेकिन यह मामला भी अदालत में लंबित होने के कारण लागू नहीं हो सका। इसके चलते कई भर्तियां अटक गईं। सरकार ने अस्थायी समाधान के तौर पर 13 प्रतिशत पदों को रोकते हुए 87 प्रतिशत पदों के परिणाम जारी कराए, लेकिन शेष पदों के लिए पात्र युवा लगातार असमंजस में हैं।
आयु सीमा बढ़ने और अन्य परीक्षाओं की पात्रता खत्म होने से युवाओं की परेशानी और बढ़ती जा रही है। ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर सर्वदलीय सहमति बनाने के प्रयास भी किए गए, लेकिन इसके बावजूद अब तक ठोस समाधान सामने नहीं आ सका है।





