धान खरीदी महाअभियान बना किसानों के लिए मुसीबत, बिलासपुर में दफ्तर-दफ्तर भटकने को मजबूर किसान

बिलासपुर।प्रदेश में 15 नवंबर से धान खरीदी का महाअभियान पूरे जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। 48 दिन बीत जाने के बाद भी कई किसान अपनी ही उपज बेचने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकने को मजबूर हैं। खेतों में दिन-रात मेहनत करने वाला किसान अब सिस्टम की तकनीकी खामियों और अफसरशाही का शिकार बन गया है।

धान खरीदी में सबसे बड़ी परेशानी एग्रिस्टेक पोर्टल बनकर सामने आई है। पोर्टल में तकनीकी गड़बड़ियों के कारण कई किसानों का रकबा “निरंक” यानी शून्य दिख रहा है। ऐसे में किसान चाहकर भी खरीदी केंद्रों पर धान नहीं बेच पा रहे हैं। मजबूरी में उन्हें तहसील और पटवारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

ऐसा ही एक मामला बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र से सामने आया है। यहां के एक किसान का कहना है कि पोर्टल में उनका रकबा सही तरीके से दर्ज नहीं हो पाया, जिसकी वजह से उनकी धान खरीदी अटक गई है। कई बार तहसीलदार और पटवारी कार्यालय जाने के बावजूद अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है।

पीड़ित किसान ने गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका दावा है कि रकबा सुधारने के नाम पर पटवारी ने उनसे करीब 5 हजार रुपये की रिश्वत ली, लेकिन इसके बाद भी पोर्टल में कोई सुधार नहीं किया गया। नतीजा यह है कि किसान की धान बिक्री अब तक नहीं हो पाई और आर्थिक तंगी बढ़ती जा रही है।

किसानों के हित में शुरू किया गया धान खरीदी का यह महाअभियान अब सवालों के घेरे में है। तकनीकी खामियां और कथित भ्रष्टाचार किसानों की परेशानियों को और बढ़ा रहे हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है, दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है और किसानों को कब तक राहत मिल पाती है।

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