नए ट्रांसजेंडर बिल से पहचान संकट का डर, छत्तीसगढ़ में बढ़ा विरोध

ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन विधेयक 2026 को लेकर छत्तीसगढ़ में LGBTQ+ समुदाय के बीच गहरी चिंता और नाराजगी देखी जा रही है। समुदाय के लोगों का कहना है कि नए कानून से उनकी पहचान, अधिकार और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर पड़ सकता है। रायपुर समेत कई जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किए जा रहे हैं।
समुदाय के सदस्यों का आरोप है कि पहले जहां उन्हें अपनी पहचान स्वयं तय करने का अधिकार था, वहीं अब मेडिकल जांच और सख्त नियमों को अनिवार्य किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह उनकी गरिमा के खिलाफ है और इससे उनकी पहचान ही खतरे में पड़ गई है।
रायपुर में रहने वाले एक ट्रांसमैन ने बताया कि उन्होंने अपनी पहचान के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया, सर्जरी करवाई और लाखों रुपये खर्च किए। लेकिन नए कानून के बाद उन्हें डर है कि उनकी पहचान को मान्यता नहीं मिलेगी और पढ़ाई व नौकरी पर भी संकट आ सकता है। दस्तावेजों में जेंडर असमानता के कारण उन्हें पहले भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।
समुदाय के अन्य लोगों ने भी आशंका जताई है कि इस बिल के कारण उनके आधार, राशन कार्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज रद्द हो सकते हैं। उनका कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने बताया कि उन्होंने वर्षों की मेहनत से अपनी पहचान बनाई है, लेकिन अब उन्हें डर है कि यह सब कुछ पलभर में खत्म हो सकता है। उनका कहना है कि समाज में पहले से ही उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है और नए नियम उनकी मुश्किलें और बढ़ा सकते हैं।
वहीं, कानून के जानकारों का कहना है कि सरकार का उद्देश्य वास्तव में जरूरतमंद लोगों की पहचान कर उन्हें लाभ पहुंचाना है, लेकिन यह संशोधन स्व-पहचान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। इसे 2014 के नालसा फैसले के विपरीत माना जा रहा है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान तय करने का अधिकार दिया गया था।
समुदाय की मांग है कि इस बिल को वापस लिया जाए और उन्हें पहले की तरह अपनी पहचान और अधिकारों के साथ जीने की स्वतंत्रता दी जाए।





