छत्तीसगढ़ में नदियों के किनारे खोजी जाएंगी नई पुरातात्विक धरोहरें

रायपुर। भारतीय पुरातत्व विभाग ने छत्तीसगढ़ के नदियों के किनारे नई पुरातात्विक धरोहरों की खोज का निर्णय लिया है। इसके लिए विभाग ने वर्ष 2035 तक का विस्तृत विजन प्लान तैयार किया है, जिसका उद्देश्य प्रदेश को राष्ट्रीय पुरातात्विक मानचित्र पर स्थापित करना है। योजना के तहत शैलचित्रों को संरक्षित करना, मिट्टी के बर्तनों (मृत्तिकागढ़) का दस्तावेजीकरण, नई साइटों की पहचान और ऐतिहासिक बसाहटों की जानकारी इकट्ठा की जाएगी।
रायपुर जिले के रीवा गांव में मौर्य और कल्चुरी काल के अवशेष मिले हैं, जो बिड्स निर्माण केंद्र के प्रमाण माने जा रहे हैं। वहीं, सरगुजा के महेशपुर में सोमवंशी, त्रिपुरी और कल्चुरी काल के मंदिर, मूर्तियां और टीले मिले हैं, जिन्हें संरक्षित स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। प्रदेश में अब तक ताम्र व पाषाण युगीन स्थलों की खोज नहीं हुई है, जिसे भविष्य की योजना में शामिल किया गया है। रायगढ़, कोरबा और कांकेर क्षेत्रों में मौजूद 80 से अधिक शैलचित्रों की सुरक्षा के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और पुरातत्व विभाग ने एमओयू किया है।
संस्कृति पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग के अधिकारियों ने बताया, कि शिवनाथ, इंद्रावती, रेणुका, हसदेव और जोंक नदियों के आसपास सर्वे कर खुदाई की जाएगी। अब तक तीन मृत्तिकागढ़ मिल चुके हैं, बाकी की खोज जारी है। मल्हार, रीवा और तरीघाट में की गई खुदाई से यह साबित हुआ है कि यहां प्राचीन बस्तियां थीं। इस योजना से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी और पुरातात्विक धरोहरों को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में मदद मिलेगी।





